Showing posts with label बस यूँ ही.... Show all posts
Showing posts with label बस यूँ ही.... Show all posts

Wednesday, March 4, 2020

बहुत खलता है ......., एक खूबसूरत ​रिवायत का यूं मर जाना...!


एक समय था जब होली के त्योहार में प्राकृतिक रंगों के साथ एकता, भाईचारे और सौहार्द के रंग भी मिले होते थे। आज न ही वो आपसी सौहार्द है और न ही त्योहारों में वो खूबसूरती। न जाने कितनें ही त्योहारों की पुरानी परंपराएं विलुप्त होती जा रहीं हैं, मैनें भी अपने सामने होली की एक खूबसूरत परंपरा को इसी तरह मरते देखा है.......।
photo: google

ये 90 के दशक की बात है। मैं और मेरी बहन दोनों के लिए हर बार होली आने से चार दिन पहले ही मां नए कपड़े खरीदकर ले आती थीं। हम जब तक उन्हें छूकर नहीं देख लेते तब तक हमें यकीन नहीं होता ये सोचकर कि कहीं मां होली वाले दिन हमें पुराने कपड़े न पहना दें।
नई ड्रेस के बाद मां का दूसरा काम था लकड़ी की उस कश्मीरी टोकरी को निकालना, जिसे वह अपनी अलमारी में सहेज कर रखती थीं। उधर, इस टोकरी को फूलों से भरने की हमारी जद्दोजेहद एक दिन पहले ही शुरू हो जाती थी। इस दिन की खुशी अलग ही होती थी, क्योंकि इस दिन पापा के साथ अपने खेतों पर जाने का मौका जो मिलता था।
जितनी देर पापा खेत पर होते, तब तक दूर तलक फैली सरसों के न जानें कितने खूबसूरत पीले फूलों को बटोर लिया जाता। लेकिन सिर्फ पीले से काम कहां चलता, बालमन को तो नीला, गुलाबी, हरा सभी रंग के फूलों की ललक रहती। इसके लिए सड़कों पर खड़े पलाश, कनेर, अनार और कचनार जैसे पेड़ काफी थे। चिल्ला- चिल्लाकर पापा से ट्रैक्टर रोकने को कहते और ..धम्म से कूदकर सुर्ख फूलों को चुन लाते। हां, इस पूरी प्रक्रिया में पापा को अन्य दिनों की अपेक्षा लेट हो जाता था। जाहिर है बच्चों की जिद के आगे आखिर हर पिता को झुकना ही पड़ता है।
घर पहुंचने तक के रास्ते में यदि किसी के घर के बाहर गुलाब खिले दिख गए तो कहना ही क्या? फिर से ट्रैक्टर रुकवाया और झट से दो-चार सुर्ख और गुलाबी गुलाब झपट लिए। कई बार इस मुश्किल काम में कांटों ने नन्हीं उंगलियों को चीरा भी। सब चलता था, क्योंकि एक हनक थी कि होली की बच्चा पार्टी में हमारे पास सबसे ज्यादा और खबूसूरत फ्लावर्स होने चाहिए। अब रात भर फूलों को सही सलामत रखने की जिम्मेदारी मां की होती।
सुबह होते ही फूलों को बिचूरकर टोकरियों में रखने की तैयारी शुरू हो जाती। दोपहर को तीन बजते ही मां हम दोनों को नई ड्रेस पहनाकर तैयार कर देती और फूलों की टोकरी हाथों में थमा देती। साथ ही ये भी समझा देती कि शैतानी में चोट न मार लेना! पूरे गांव में घूमकर पांव न दुखा लेना! घर वापस आने में ज्यादा देर न कर देना, आदि।
सारी तैयारियों के बाद अब किससे सब्र होता, मां इजाज़त दे और हम अपनी फ्रेंड्स को लेने उनके घर पहुंच जाएं। लेकिन मां के मुताबिक बाकी लड़कियों को तुम्हारे घर आने दो, तब उनके साथ निकल जाना।
चूड़ियां खनकाती, हाथ में फूलों से भरी टोकरियां लिए चहचहाती छोटी लड़कियों का शोर जैसे ही घर तक पहुंचता, सभी घरवाले निकलकर आंगन में आ जाते। सारी बच्चियां घर के सदस्यों पर अपनी-अपनी टोकरियों से फूल बिखेरतीं और हैप्पी होली बोलकर विश करतीं।
यहां से हम भी टोली में जुड़ जाते और गांव में घूमते हुए हर घर में जाकर सबको नमस्ते करते..., फूल बिखेरते..., हैप्पी होली बोलते और निकल जाते...। इस दौरान घर के लोगों की उन बच्चों से भी पहचान हो जाती जिन्हें वे अब तक नहीं पहचानते थे। कोई प्यार से गोद में उठा लेता तो कोई तरह-तरह की मिठाइयां परोस देता। कोई सौ सवाल पूछता। कोई मस्ती में डराने की काशिश करता, तो कोई पढ़ाई का स्टेटस चैक करने लग जाता।....और इस तरह शाम हो जाती और हम घर लौट आते।
ये एक खूबसूरत तरीका था समाज को, लोगों को जानने का, रिश्तों की पहचान करने का, संस्कारों को जीने का। ये एक खूबसूरत याद थी जो आज भी हमारे दिलों में जिंदा है। ये एक खूबसूरत परंपरा थी जिसका अनायास ही मिट जाना बड़ा खलता है। अब गांव में होली पर किसी का घर लाड़लियों की रंग-बिरंगी टोकरियों से गिरे उन फूलों से नहीं महकता, अब लड़कियों की टोली फूलों से त्योहारों की मुबारकबाद देने नहीं जाती।
आज समय बदला चुका है, हम कहते हैं कि हमने विकास किया है लेकिन उस विकास की प्रक्रिया में समाज के चेहरे को नकारात्मकता के साथ बदल दिया है। मुझे नहीं लगता कि आज कोई भी मां-बाप अपनी पांच या दस साल की बेटी को अपने पड़ोसी के यहां बेखौफ भेज दें, या इस तरह बच्चियां आजादी से किसी के घर जाकर एक-दूसरे को विश कर सकें। हमने अपने बच्चों के लिए कैसा माहौल बना दिया है ?
सवालों के जवाब हमारे ही पास हैं बदलना भी हमें ही है। ये बेहद खूबसूरत परंपरा जिस तरह विलुप्त हो गई इसी तरह न जानें और भी कितने ही ट्रेडिशन खत्म होने की कगार पर हैं या हो चुके हैं, जिन्हें सहेजकर रखने में हम सभी को सहयोग करने की जरूरत है। आज भी जब होली का जिक्र होता है तो वह अनमोल दिन कभी नहीं भूलता। बस कुछ बाकी है तो खूबसूरत यादें, जो आपको ताजगी देती हैं, ऊर्जा देती हैं।

Friday, August 14, 2015

सेल्फ पॉट्रेट....

वो सांवली सी लड़की........
 मिलती है आसमां की उड़ान में सदा
 उसे कहो उतर जरा जमीं से पांव लगाए कभी।
वो चुपचाप सी लड़की.........
बोलती है, मगर एहसास को लफ्जों में पिरोकर
गाती है चमकती आंखों से, अनसुना सा गीत कोई
देखूं चेहरा अगर  पर्दा-ए-खामोशी गिराए कभी।
वो परेशान सी लड़की...........
लपेटे आती है ख्वाहिशों को जुल्फ में कैद किए
वो कांच की परीवश है कि छूते ही न चटख जाए कहीं
मचलती है कि फिर संभलती है दिल की तरह
किसी अकेली शाम में सोचती हूं उसे कॉफी पे बुला लूं।
 पूछूं हाल-ए-दिल मुझको सुनाए कभी।
 वो सांवली सी लड़की........।

Saturday, May 23, 2015

भलाई...................

मुझे मालूम नहीं था कि यह नो पर्किंग जोन है, बस कार पार्क की और उतरकर चल दी। कुछ देर बाद लौटी, तो एक पुलिस वाला कार पर कुहनी गढ़ाए शायद मेरे ही आने का इंतजार कर रहा था। मैं उसे देखकर थोड़ा सहमी, लेकिन सामान्य होकर गाड़ी के करीब पहुंची।
 मैडम जी गाड्डी आप ही की है के.....? , पुलिसवाले ने देहाती लहजे में पूछा .
जी हां, है तो मेरी ही, लेकिन क्या तकलीफ दे रही है?
गाड्डी 'नो पार्किंग' में खड़ी है, चालान बनेगा रॉन्ग पर्किंग का। साढ़े चारसौ रुपए भरने पडयेंगे जुर्माने के तुरंत।
मैनें अचंभित होकर कहा, क्या.......? अरे मुझे सच में नहीं पता था कि ये नो पार्किंग जोन है और यहां कौन सा बोर्ड लगा है, जिस पर ये लिखा हो कि यहां कार पार्किंग मना है?
मैड्म पढ़ी-लिखी होके भी बहस कर रही हो। इब जल्दी से जुर्माना भर दो।
पढ़ी-लिखी हूं तब ही बहस कर रही हूं, लेकिन आपको बता दूं कि मैं एक भली लड़की हूं और भले परिवार से ताल्लुक रखती हूं। खुद भी ईमानदारी से काम करती हूं और दूसरों को भी इसके लिए प्रोत्साहित करती हूं। मुझे मालूम होता, तो मैं यहां गाड़ी बिल्कुल न पार्क करती ।
पुलिसमैंन ने कहा- भले आदमी तो हम भी बहुत है और भले लोगों की हमेशा मदद किया करते हैं। ईमानदारी और भलाई के लिए अक्सर हमें ईनाम भी मिलते रहते हैं।
मुझे इस पर हंसी आई और मैनें सौ रुपए पर्स से निकाल कर कार पर रखी उसकी हथेली के नीचे सरका दिए और कहा- तभी तो महकमे को आप जैसे लोगों पर बहुत गर्व है। पुलिसमैन ने मुटठी बंद की, नोट को जेब में ठूंसा और बोला, मैड्म जी अगर दुनिया में सब आपकी तरह भले हो जाएं, तो हमें कोई शौक थोड़े ही है चालान बनाने का।  -डिम्पल सिरोही

Saturday, May 9, 2015

'दिल' 'ख्वाहिशों का कारखाना' था

न आह न आहट
न हलचल, न सांस, न जुंबिश
कितना जिद्दी है बदन उसका
सख्त हथौड़े से पैनी कैंची से
खोली जा रही हैं उसके जिस्म की परतें।
बड़ी बेतरतीब सी दुनिया,
 उसके सीने से बाहर निकली है।
किसी रोशनदान से झांकते
धूप के टुकड़े की आंख में कुछ नमी सी है।
बस इक हवा है जो कभी बेजान होठों से टकराकर
कभी सिसकियां तो कभी आह भरती है।
सूखे खून की कुछ वजहें फर्श पर
उभरी हैं एक एब्स्ट्रेक्ट पेंटिंग की तरह,
ेएक पहली से तन को सुलझाने में और भी
उलझ गए हैं औजार,
कठोर हाथों से दस्ताने उतारते हुए
एक धीमी आवाज कहती है
और कुछ भी नहीं , उस जिस्म की
बेड़ियों में बंधा 'दिल' 'ख्वाहिशों का कारखाना' था। - डिम्पल सिरोही-

Sunday, December 21, 2014

खिड़की से मेरी चांद.......

यूं ही नहीं आता फलक पर 
सुनहरा चांद,
 कोई है जो रोपता है
रोशनी का बीज क्षितिज के उस पार,
कोई है जो सींचता है,
हर रोज नियम के साथ,
बुनता है रेशा-रेशा
किरणों का कोई बांध,
तब
उभरता है अर्श पर
बनके आधा सा टुकड़ा चांद,
कोई है जो सिखाता है
अंगुली पकड़कर चलना इसे,
कोई है जो गोद में लेकर दिखाता है
दुनिया की राह,
कोई है जो दुलार देकर उसे
कायनात को सौंप देता है।

तभी तो हर दिशा में दौड़ता, मुस्कुराता,
अठखेलियां करता हुआ,
झांका करता है हर रोज,
खिड़की से मेरी चांद। 

                       -डिम्पल सिरोही

एक सुरीला कलाम सुनाती है खामोशी,





एक सुरीला कलाम सुनाती है खामोशी,
सन्नाटों में जब गुनगुनाती है खामोशी।

लफ्ज नाकाम रहे कहने में जिसे मुद्दतों,
वो बात कह के चली जाती है मुझसे खामोशी।


सांझा करने लगी हूं राज-ए-दिल इसी से अब,।
गुफ्तगू करने लगी है मुझसे खामोशी।


हो गई हूं और भी करीब अपने ,
मुझको मेरी पहचान सिखाने लगी है खामोशी।


ये शोर दे सका न मुझे कुछ अश्क के सिवा
बस एक मासूमियत से पेश आती है खामोशी। 

                                          -डिम्पल सिरोही

Saturday, September 20, 2014

कल रात
गोलमटोल चांद को देखकर
याद आया चांद की ही तरह,
एक शून्य ही तो हैं हम सभी
कुछ छोटे और कुछ बड़े-बडे,
अनगिनत और अलग रंगों के
कुछ भूरे कुछ मटमैले से।
विचरण करते हैं इस गोल दुनिया में
जहां से शुरू होते हैं वहीं हो जाते हैं खत्म
जिस तरह चांद अनंत अंतरिक्ष में
जहां से चलता है वहीं वापस आकर,
थकान से मूंद लेता है आंखें
इसी तरह हम भी
शून्य से चलकर मिट जाते हैं शून्य पर
और चलता रहता है
सिलसिला शून्य का निरंतर।
- डिम्पल सिरोही

Saturday, July 26, 2014

बदले हजार दौर, मगर रोशनी रही.......


वो कामयाब क्या हुए, इतरा रहे हैं यूं
जैसे कि उनके पांव के नीचे जमीं नहीं।

परवाने जल के मर गए, शमा न बुझ सकी
बदले हजार दौर, मगर रोशनी रही।

हमने दिए जलाए थे इक इश्तियाक से
जल जाएगा शहर ही ये सोचा न था कभी।

फुरसत के लम्हे मांग के मसरूफियत से तुम,
आओ कि बेकरारी की आदत नहीं रही।

इजहार-ए-इश्क तुमको खफा कर न दे कहीं
ख्वाहिश ये आज भी मेरी दिल में ही रह गयी।

Sunday, July 6, 2014

याद शहर....

  मेरे मन में कल ख्याल आया कि मैं जब पहली बार मेरठ आई थी, तो सोचा था यहां बहुत सी ख्वाहिशों, सपनों और कल्पनाओं को पंख लगाने हैं। लेकिन मुझे ये शहर कभी रास नहीं आया। हो सकता है इसे मैं पसंद नहीं या मुझे यहां रहने का ढंग नहीं आता। हर बार इस शहर से दूर हो जाने की योजना बनती है, मगर मुकाम तक नहीं पहुंचती। पता नहीं क्यों, ये शहर मुझे कहीं और क्यों नहीं जाने देता, हर बार मुझे यहां किसी न किसी बहाने कैद किए रहता है। मैं ऊब गई हूं इस शहर से अलविदा कहना चाहती हूं इसे। इसी ऊब को मैनें कुछ यूं निकाला है                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                              धूप धुंधलाई हुई और जिंदगी कुम्हलाई हुई सी,
तपती धूप में जल जाते थे पांव,
 सड़कों पर दौड़ता था सन्नाटा कुछ बुदबुदाता सा,
 कुछ जिस्म रेंगते थे, कुछ रूहें ठिठुरती थीं धूप की चुभन से,
मेरी परछांई मुझी में समा जाती थी हर कदम
 आंखों में ख्वाब समेटे चली जा रही थी मैं
 हाथों में जिंदगी थामे,
 हा,ं जिंदगी ही तो थी
 कुछ ओढ़न, पैरहन और खाने का सामान,
 इस शहर में कोई भी तो नहीं था मेरा
 अकेले घूमना था मुझे सरे शहर तेरा।
 बरसती थी धूप उन गलियों में फिर भी था अंधेरा
 खुले थे द्वार,
 मगर खाली था बसेरा।
मैंने झांका तो वक्त के कुछ बासी लम्हों को पाया,
आवाज दी मगर कोई आहट, साया कोई भी तो नहीं आया।
कितना अकेला था यह शहर,
 हर मोड़ पर रूक के पुकारा कि कोई सुनेगा आहट,
 कोई रोकेगा कहेगा कि कुछ देर यहां ठहर।
 फिर लगा कहीं ऐसा तो नहीं,
 हो ये लुटेरों का शहर।
सोचा ही था कि  आके एक बच्चे ने पकड़ लिया दामन
बोला अजनबी हो.. आओ तुम्हें इस शहर से मिलवाता हूं
उस आवाज में कसक थी मासूमियत और सच्चाई थी
हाथ पकड़े हुए बढ़ चला था खामोशियों की ओर
 मेरे सवालों को मिला भी न था जवाब कि उसने इशारा किया
 यहां रहती है मुफ़लिसी,लाचारी, बीमारी, हयात, यहीं मैं रहता हूं।
ये कर्जदारों, ब्याजखोरों, मनचलों और लुटेरों को मोहल्ला है।
 इस कोने पर रहती है थोड़ी ईमानदारी सज्जनता और होशियारी
पर्दे में ही रहा करती है अक्सर
उस तरफ कभी न जाना वहां मुर्दे सोएं हैं।
साया था या फरिश्ता, इतना कहकर गुम हो गया था कहीं।
 उसके जाते ही मेरे कानों में गूंजा भयंकर स्वर
घने शोर की आवाज सुनी थी अचानक मैनें
या किसी ख्वाब से जागी थी यकायक मैं।
 नहीं, अचानक नींद से जागा था ये शहर
 मैनें देखा, मुझे हिरासत में ले चुकीं थी सैकड़ों आवाजें।
 इस जुर्म की गिरफ्त में थी मैं कि मैंनें देखा था
 एक ख्वाब।
शोर के शहर में आज तक बंदी हूं वहां मैं जहां
 न अंधेरा है, न उजाला है, न दिन न रात,
 थकते-टूटते जिस्मों में जब दर्द को नींद आने लगती है
 ज़र्द चेहरा लिए एक चांद फ़लक पर आता है हर रोज,
 कहता है मुश्किल है, मगर
कैद-ए-जां से अच्छा है आसमानों को शहर
 मुझे यकीं है मिलेगी एक दिन मुझको रिहाई जरूर
होंगे आजाद सारे ख्वाब फ़लक के चांद की तरह
 जिंदगी की नव्ज़ पर पड़े बेड़ियों के निशान
 वक्त तो मिटा न सकेगा मगर,
 इसी बहाने ही सही रहेगा तेरा याद शहर।

Saturday, July 5, 2014

 घर की अलमारी में, दराजों में, पुराने बक्से में
 बहुत ढूंढा  मगर, बीता वक्त कहीं मिला नहीं।

Saturday, April 5, 2014

फिर बढ़ेंगे रोटी के दाम......


शहर में भीड़ है, शहर में बहुत शोर है।
 शहर की सड़कों को खूबसूरत बनाने की बात कही जा रही है,
 किसी चौराहे से सुनाई पड़ती है किसी पार्टी के उम्मीदवार की आवाज।
 बदहवास लोग शाम के अंधेरे में उसकी एक झलक पाने को बढ़े चले जा रहे हैं।
 दूर गांवों से आते हुए घंटो उसी जाम चौराहे पर रूके आॅटो में कराहती है बीमार महिला,
तमाम जुर्म, कत्ल, खुदकुशी, बीमारियों को खत्म करने के ठहाके रूकने का नाम नहीं ले रहे।
एक बेजान सी आवाज में गाली जबान पर है, ये चुनाव का मौसम है हर इक नेता इम्ताहन पर हैं।
 मुझे भी देर हो रही फिर भी सुनना पड़ता है लाउड स्पीकर का ककर्श स्वर,
 आभास हो रहा है मुझे हवा में कल घुलने वाली कड़ुवाहट का
 वोट तो मुझे भी करना है, मगर किसे...?
 अब डर लगता है नेताओं की मुस्कानों से, दोस्ती की चालों और शतरंज की बिसातों से।
 महंगाई, आतंक और दंगों से, पुलिस से, नेताओं और चुनावी फसादों से।
 अरे छोड़िए भी, फिर से वोट देंगे आप अपने ही विवेक से किसी एक को ।
 फिर आएगा पहले जैसा ही कोई शासन, फिर बढ़ेंगे रोटी के दाम,
 फिर रह जाएंगे कितने ही युवा बेरोजगार, फिर अनदेखे कर दिए जाएंगे बालमजदूरों के हाथों के छाले,
 फिर चिथड़ों में बिखर जाएगा कोई मासूम जिस्म,
 फिर आएगा चुनाव का मौसम और फिर से आप कहेंगे इस बार नहीं।

Wednesday, April 2, 2014

कमबख्त, आसमानों तक उड़ान भरती है...

दिल किसी दर्जी सा दिन को टांकता जाता है,
 जिंदगी हर घड़ी को इम्तहान करती है।
मेरे सपनों को जमा करके उछाल न दे कोई,
 यही बात  मुझे मौत से ज्यादा परेशान करती है।
 कब तलक बांध के रखें, खयालों की जुल्फ को,
 कमबख्त, आसमानों तक उड़ान भरती है।

Sunday, March 9, 2014

जब मैं सफर में होती हूं,

 जब मैं सफर में होती हूं,
 तन स्थिर होता है लेकिन
 मन को मिल जाते हैं विषय अनंत।
 मिल जाती है धूमिल पृथ्वी पर कहीं थोड़ी हरियाली,
 और ज्Þारा सा खुश होने को थोड़ी खुशियां।
मिलते हैं बहुत चेहरे पहचानने को,
खामोश रहकर भी जो कह जाते हैं कई कहानियां।
मिलते हैं कतार में पीछे की ओर भागते हुए पेड़,
बिजली के खंभे और स्कूल,
 अडिग विशाल और खड़े सेवा को तत्पर।
 दाढ़ी वाले बूढेÞ मुल्ला भी मिलते हैं
 टूटी झोंपड़ी में करते खेतों की रखवाली
 लिए तलब मगरिब की नमाज़ की।
 मिल जाता है लिए कोई अखबार हाथ में
 कई तरह के मुहं बनाता हुआ पढ़ता खबरें आज की।
 मिलता हैं मां के इंतजार में
 खेत की मेढ़ पर बैठा बच्चा
 बेचैन होकर किनारे से चुनता हुआ सपनों के कंकर।
जब शाम होती है तो गांव की पगडंडियों पर
मुझे मिलती हैं बहुत सारी बालिकाएं
बढ़ते अंधेरे को पीछे धकेलकर तेजी से घर जाती हुई।
 कई बार सफर में बज उठती है मेरे फोन की घंटी
 मधुर लगती है जब तक बजता है संगीत इसमें
फिर मेरे दृश्यों को आनंद छीन लेती है यह।
अधूरी रह जाती है कविताएं मेरी
अतृप्त रह जाता है मन यर्थाथ चित्रों से ।
कल फिर से कहीं सफर पर होंगे हम
मिलेंगे मन को क ई विरले विषय,
और फिर बजेगी मेरे फोन की घंटी और
 फिर से फूटेंगे कुछ शब्द मस्तिष्क में
 फिर रह जाएगी कोई कविता अधूरी।

Thursday, March 6, 2014

स्त्री है वह.......

On 8th March  Women's Day

आते जाते जो घटता है हर और सहा,
 किसी काम को जिसने कभी न नहीं कहा।
बेहतर दिन की आशा में हर रोज निराशा सहती है
 स्त्री है वह
 आराम नहीं है पसंद उसे न ही तुमकों तन्हा रहने देती है
 स्त्री है वह, जो गुजारती है दिन मुस्कुराते हुए
 मगर सोती है सिसकती रातें लेकर,
 स्त्री है वह
 वह, जो दिखती है बहुत मजबूत किंतु
 महसूस करती है बहुत कमजोर
 स्त्री है वह जो, खुद को संभालती है स्वयं
 गिर पड़ती है जब हर मोड़ पर
 स्त्री है वह
 खुद को खोकर मिटाती है दर्द तेरा
 स्त्री है वह जो अपने वजूद की ख्वाहिश में
एक उम्र गंवाती है।

Friday, June 21, 2013

दुश्वारियों की बारिश?

ये  बरसात क्यों मेरे लिए
 अच्छी नहीं आई
आंगन में ए गिरती बूंदें
लगती है जैसे बिखरा हो
 कोई शीशा टूटकर,
 बिखरें हों ख्वाब जैसे टकराकर
 हकीकत की जमीन से
भीगी शाम आज मुझे क्यों
 खुशी देने नहीं आई
 अब की ये  बरसात क्यों
अच्छी नहीं आई
 रंगा था कल ही जिसे,
 गिरने लगी है मिट्टी
उस दीवार की
  लेपा था फर्श कल ही
पीली मिट्टी से मैनें
 आज दिखाता है डरावने से चित्र मुझे
 आज कलमा भी तो फर्श पे हो न सकेगा।
सूखे पत्ते कुछ लकड़ियां
सब हो गए हैं नम
कुछ चुन भी लाती यदि
आज एक लौ भी तो मेरे
घर को रोशन न कर सकेगी,
आंच भी तो आज दो रोटी
 मेरे घर पका न पाएगी।
 कहीं जूठन भी तो आज बची न होगी
 सब पानी में मिल गई होगी या
  नाली में बह गई होगी।
 मेरे घर की नाजुक छत भी अब
टपकने लगी है।
इन बूंदों ने एक होकर
मेरे घर को संमंदर बना डाला है।
 गीले तख्त पर बैठा है
 पेट भरने की तलब लिए लाडला मेरा
छुपाए गोद में एक किताब अपनी
 देखता मेरी ओर एक टक,
 लिए आंखों में सवाल
कब खत्म होगी ये
दुश्वारियों की बारिश?

Monday, May 13, 2013

आसमां भी मिल जाएगा उड़कर तो देख ...............


 अपने हालात- ए- जिंदगी से लड़कर तो देख
 आसमां भी मिल जाएगा उड़कर तो देख ।

 क्यों दुनिया से यहां-वहां लड़ता फिरता है
 खुद से आगे भी कभी निकलकर देख।

ठोकर खाकर उठ जाना कोई नई बात नहीं,
 गिर किसी नजर से फिर संभलकर तो देख।

 वक्त से आगे निकलना तो बड़ी बात हुई,
दो कदम वक्त के साथ ही चलकर तो देख।

 जो भी मिलता है हमें यूं लगे मिला है पहले भी,
 अनजान कहता है मगर इस दफ़ा मिलकर तो देख।

 तूने जिसे दीवार पर लगाई थी कभी अपनीतस्वीर,
 हो गए कितने ही दिन चलके वही घर तो  देख।

Saturday, June 2, 2012

वो देती है गम हरदम ये जीन नहीं देती है..

 इक दर्दे-मोहब्बत है, इक बेरहम है ये दुनिया
वो देती है गम हरदम, ये जीने नहीं देती है

 इक राहे-फकीरी है, इक शोहरत-ए-अमीरी है
 इक सोने को तरसती है, इक सोने नहीं देती है

 इक हुस्न से नजदीकी, इक मां के आंचल की छांव
 वो जी भर के रूलाती है, ये रोने नहीं देती है

इक गैर से याराना और यारी में भी जख्म मिलें
इक करती है मरहम तो, इक सीने नही देती है

 ना पूछ मेरी सरहद, पी जाऊं समंदर को
 बस याद मगर उसकी मुझको पीने नहीं देती है।







Wednesday, May 9, 2012

 वो हर कदम पे हमें आजमाते रहे,
 अपना वादा था कि  फिर भी साथ निभाते रहे
 उनका रिवाज था इश्क-ए-दरिया का तैर कर पार करना
 हमारी फितरत थी कि इश्क किए और डूब जाते रहे।

Saturday, May 5, 2012

सालों बाद जब मिला तो गले लग कर बहुत रोया ,
जाते हुए जिसने कहा था कि तुम जैसे हजार मिलेंगे।



 

Thursday, March 22, 2012

बस यूँ ही...

कांटो  की  तो  फ़ितरत है कि नुकीले होते हैं 
कुछ  फूल मगर कांटो से भी ज़हरीले होते हैं.