Showing posts with label अखबारी पन्ने...... Show all posts
Showing posts with label अखबारी पन्ने...... Show all posts

Wednesday, February 5, 2020

सेकेंड वर्ल्ड वार में इन टैंकों ने मचा दी थी तबाही, 10 खतरनाक 'बैटल टैंक'


वैसे तो प्रथम विश्वयुद्ध में ही टैंकों का प्रयोग शुरू हो गया था पर सही मायनों में उनकी जाबांजी दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान सामने आई। इन टैंकों ने युद्ध में दोनों पक्षों के लिए अहम भूमिका निभाई। दोनों पक्षों ने दूसरे विश्व युद्ध से पहले और बाद में बड़ी संख्या में टैंकों का निर्माण किया। आज हम आपको दूसरे विश्वयुद्ध के दौर में ले चलते हैं और बताते हैं उस युद्ध के 10 सबसे ताकतवर टैंकों के बारे मेः
M4 Sherman Tank (United States)

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान निर्मित यह दूसरा सबसे मजबूत टैंक था। अमेरिका और मित्र देशों के पश्चिमी सहयोगियों ने इसे बनाया। M4 Sherman Tank में 90 राउंड के साथ औसतन 75 mm का मेन गन था और इसका आर्मर अपेक्षाकृत पतला (76mm) था। वर्ष 1941 में इसे पेश किया गया। इसका नाम अमेरिकी सिविल वार के दौरान प्रसिद्ध जनरल William T Sherman के नाम पर रखा गया था। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान ऐसे 50,000 टैंक बनाए गए।

Sherman Firefly (Britain)

Sherman के ब्रितानी संस्करण में विध्वंसक 17 pounder antitank gun फिट किया गया था। यह तब तक के सबसे घातक टैंकों में से एक माना जाता था। इससे धुरी राष्ट्र भी डरते थे। विश्वयुद्ध खत्म होने ऐसे 2,000 टैंक बनाए ज चुके थे।

Panzer 4 (Germany)

जर्मनी में निर्मित इस टैंक का दूसरे विश्वयुद्ध में काफी इस्तेमाल किया गया। इसमें 75mm की मेन गन लगी थी। इस टैंक ने 1200 मीटर की रेंज में सोवियत टैंक T 34  की धज्जियां उड़ा दी थीं। बाद में सोवियत टैंकों ने इसकी काट खोज ली और मास्को से लेकर बर्लिन तक सोवियत संघ ने लगभग 6,000 panzer IV  टैंकों की धज्जियां उड़ा दी थीं।

T- 34 (Soviet Union)

यह ऐतिहासिक टैंक दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान सर्वाधिक संख्या में निर्मित और सबसे ज्यादा उपयोग में लाया गया। सोवियत संघ ने लगभग 84,000 टैंकों का निर्माण किया था। बचे हुए टैंकों में से बहुत से अभी भी एशिया और अफ्रीका में हैं। इसकी लोकप्रियता इसके 45mm sloping frontal armor के कारण थी। जो panzer IV का प्रतिरोधी था।

MK V Panther (Germany)

एक मीडियम जर्मन टैंक जो लड़ाई के मैदान में 1943 में शामिल हुआ और लड़ाई खत्म होने तक सेना में बना रहा। यह तेज (34 मील प्रति घंटे) और मजबूत (20mm armor) टैंक था। और इसमें 79 से 82 HE rounds के साथ 75एमएम गन था। जो किसी भी टैंक को ध्वस्त कर सकता था। हालांकि बाद में सोवियत T-34 का निर्माण अधिक संख्या में हुआ। लेकिन युद्ध के आखिर तक इसकी स्थिति खासा मजबूत बनी रही।

Comet IA 34 (Britain)

ब्रिटेन के सबसे ताकतवर कॉम्बैट टैंकों में से एक था जिसमें उच्च क्षमता का 77 mm का मेन गन लगा था। जो 17 पाउंडर गन का ही एक छोटा रूपांतरण था। Comet IA 34 दूसरे विश्वयुद्ध के अंतिम चरणों में लड़ाई में शामिल हुआ। लेकिन अपने इस्तेमाल के कम समय में ही इसने एक मजबूत हथियार के रूप में अपनी ख्याति बना ली थी।

Tiger I (Germany)

Tiger I जर्मनी का एक हैवी टैंक था जिसके पास 920-120 राउंड का 88 mm मेन गन था जो जमीन और हवा दोनों जगह निशाना साध सकता था। इसकी 38 किलोमीटर प्रति घंटा की टॉप स्पीड थी। यह एक खतरनाक जर्मन टैंक था जिससे इसके शत्रु देश डरते थे लेकिन बाद में इसकी भी काट खोज ली गई थी।

IS 2 Iosif Stalin Tank (Soviet Union)

IS टैंक फैमिली के IS 2 हैवी टैंक में विशाल 122 mm मेन गन लगा था तथा एक sloped 120mm मोटे armor से सुसज्जित था। इसका निर्माण 1944 में शुरू हुआ और कुल 2252 IS टैंकों का निर्माण किया गया। बर्लिन की लड़ाई में IS 2 टैंकों का उपयोग मेन गन द्वारा High Explosive राउंड से जर्मनी के भवनों का नाश करने के लिए किया गया।

M26 Pershing Tank (United States)

अमेरिका द्वारा निर्मित हैवी टेंक दूसरे विश्वयुद्ध के अंतिम में इस्तेमाल में लाया गया। Sherman टैंकों की तुलना में Pershing अधिक आधुनिक टैंक था। 90mm की हैवी मेन गन वाला यह टैंक टाइगर जैसे टैंकों को ध्वस्त करने में सक्षम था। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद Pershing टैंक का कोरिया युद्ध में इस्तेमाल किया गया और यह लगातार अमेरिका के लिए एक घातक टैंक के रूप में काम करता रहा।

Jagdpanther (Germany)

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान इस्तेमाल में लाया गया सबसे शक्तिशाली विध्वंसक टैंक। 88mm मेन गन, 57 राउंडस और 100mm frontal armor क्रू को सुरक्षा प्रदान करता था। यह तीव्र गति के साथ दूर तक निशाना साध सकता था। लड़ाई के दौरान सिर्फ 415 टैंकों का निर्माण किया गया। युद्ध में 30 जुलाई 1944 को इसने France में St. Martin De Bois के निकट सिर्फ दो मिनट में 11 चर्चिल टैंकों को तहस-नहस कर दिया। हालांकि युद्ध के आखिर में शामिल होने के कारण इसका प्रभाव सीमित रहा।

ये हैं समंदर में चलते-फिरते 13 एयरबेस, जानें किस देश के पास कितने 'एयरक्राफ्ट कैरियर'


विमानवाहक युद्धपोत यानी समंदर में चलता फिरता एयरबेस, जिस पर विमान उड़ान भर सकते हैं और उतारे भी जा सकते हैं। आज ताकतवर देशों की नेवी के पास अपने एयरक्राफ्ट कैरियर हैं। लेकिन कुछ देश ऐसे भी हैं जिनके पास आधुनिक तकनीक से लैस युद्धपोत हैं। भारत भी ऐसे ही  देशों में शामिल हो चुका है आइये जानते हैं किस देश के पास कितने विमानवाहक युद्धपोत हैं:-

अमेरिका के पास है विशाल बेड़ा


अमेरिका की सेना दुनिया में सबसे ताकतवर मानी जाती है।  अगर बात विमानवाहक युद्धपोतों की की जाए तो इस मामले में भी वह सबसे आगे है। अमेरिका के पास वर्तमान में दस विमानवाहक युद्धपोत हैं। एक विमानवाहक युद्धपोत उसके पास रिजर्व में भी है। खास बात यह कि उसके ज्यादातर युद्धपोत अत्याधुनिक तकनीक से लैस हैं। 

चीन के पास भी हैं एडवांस एयरक्राफ्ट कैरियर 


बीते रविवार को चीन ने अपनी नौसेना को अत्याधुनिक बनाने की दिशा में एक और पड़ाव पार किया जब उसने पूरी तरह से अपने देश में तैयार विमानवाहक पोत को समंदर में उतारा। इससे पहले चीनी नौसेना के पास 'लिआओनिंग' नामक पोत है जिसे उसने वर्ष 2012 में अपनी नौसेना में शामिल किया था। रूस में निर्मित इस विमानवाहक युद्धपोत को उसने 1998 में यूक्रेन से खरीदा था। वर्ष 2030 तक चीन अपने बेड़े में चार विमानवाहक पोत शामिल करना चाहता है।

इटली


इटली की नौसेना की गिनती भी दुनिया की ताकतवर नौसेनाओं में होती है। उसके पास फिलहाल दो विमानवाहक युद्धपोत हैं। ये दोनों पोत क्रमशः 1985 और 2008 से सर्विस में हैं। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान सन 1944 में इटली का एक विमानवाहक युद्धपोत डूब गया था और 1950 के दशक में उसे एक विमानवाहक पोत रिटायर करना पड़ा था। 

ब्रिटेन


एक वक्त था जब विमानवाहक पोतों के मामले में ब्रिटेन की तूती बोलती थी। तब उसके पास 40 पोत हुआ करते थे लेकिन आज उसके पास कोई विमानवाहक युद्धपोत नहीं है। हां, दो विमानवाहक युद्धपोत बनाने पर जरूर काम चल रहा है। दूसरे विश्वयुद्ध में ब्रिटेन के चार पोत नष्ट हो गए थे। 

फ्रांस


फ्रांस की नौसेना के पास इस समय एक विमानवाहक युद्धपोत है। फ्रांस ने दूसरे विश्व युद्ध के बाद के दशकों में सात विमानवाहक युद्धपोतों को रिटायर किया है।

जापान


विमानवाहक पोतों के मामले में दूसरे विश्व युद्ध से पहले जापान भी बड़ी ताकत था। उसके पास 20 विमानवाहक युद्धपोत थे। अमेरिका के साथ लड़ाई में उसे बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। उसके 18 पोतों को अमेरिका ने युद्ध में नष्ट कर दिया। बचे दो पोतों को उसने विश्वयुद्ध खत्म होने के कुछ समय बाद कबाड़ में भेज दिया।  

रूस


सोवियत संघ का जब विघटन नहीं हुआ था तब विमानवाहक पोतों के मामले में वह बड़ी ताकत था। लेकिन आज रूस के पास सिर्फ एक विमानवाहक युद्धपोत है। सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस ने चार विमानवाहक युद्धपोतों में से तीन को स्क्रैप कर दिया, जबकि एक भारत को बेच दिया था।

भारत


रूस में तैयार आईएनएस विक्रमादित्य 2013 से भारतीय नौसेना का हिस्सा है। आईएनएस विक्रांत 2016 तक इस्तेमाल होने के बाद रिजर्व में है। भारत का एक विमानवाहक युद्धपोत तैयार हो रहा है।

कनाडा


कभी विमानवाहक पोतों के मामले में कनाडा भी बड़ी ताकत था। साठ वर्ष पहले तक उसके पास ऐसे पांच पोत थे। किन्तु 1960 और 1970 के दशक में उन्हें रिटायर कर दिया। इस समय कनाडा के पास ऐसा कोई युद्धपोत नहीं है।

ऑस्ट्रेलिया


कभी ऑस्ट्रेलिया के पास भी तीन विमानवाहक युद्धपोत थे। 1950 के दशक के अंत तक उसने दो पोतों को रिटायर कर दिया। बचा एक विमानवाहक पोत भी 1982 तक ही सेवा में रहा।

स्पेन


खुआन कार्लोस यह नाम है स्पेन के विमानवाहक युद्धपोत का। वर्ष 2010 से यह शानदार पोत स्पेन की नौसेना का हिस्सा है। एक विमानवाहक युद्धपोत स्पेन के पास रिजर्व में भी है।

ब्राजील


ब्राजील के पास वर्तमान में फ्रांस में निर्मित एक विमानवाहक युद्धपोत है। इससे पहले 1960 के दशक में खरीदा गया विमानवाहक पोत 2001 तक ब्राजीली नौसेना में शामिल रहा है ।

थाईलैंड

थाईलैंड के पास फिलहाल  एक विमानवाहक युद्धपोत है, जिसे 1997 में तैयार किया गया था। थाई नौसेना में शामिल यह पोत आज भी अपनी सेवाएं दे रहा है।

भारतीय सेना की वे 15 रेजीमेंट, जिनसे खौफ खाते हैं दुश्मन !



भारतीय थलसेना  भारतीय सशस्त्र बल का सबसे बड़ा अंग है। भारतीय सेना की उत्पत्ति ईस्ट इण्डिया कम्पनी की ब्रिटिश भारतीय सेना के रूप में भारतीय राज्यों की टुकड़ियों से हुई थी  जो स्वतंत्रता के पश्चात राष्ट्रीय सेना के रूप में परिणीत हुई। भारतीय सेना में टुकड़ी और रेजीमेंट का विविध इतिहास रहा है जिन्होनें दुनिया भर में कई लड़ाई और अभियानों में हिस्सा लिया है और बड़ी संख्या में युद्ध सम्मान अर्जित किये हैं। इन  रेजीमेंट्स को जरूरत के हिसाब से मोर्चों पर भेजा जाता है। आज हम आपको बता रहे हैं सेना की कुछ प्रसिद्ध रेजीमेंट्स के बारे में :-

पैराशूट रेजीमेंट 


पैराशूट रेजीमेंट की स्थापना आजादी से पहले 29 अक्टूबर 1941 को हुई थी।ये रेजीमेंट देश के सभी सैन्य बलों को युद्ध के दौरान हवाई मदद पहुंचाता है। सन 1999 में कारगिल युद्ध के समय 10 में से 9 पैराशूट बटालियन की तैनाती ऑपरेशन विजय के लिए हुई। कारगिल युद्ध में पैराशूट बटालियन ने महात्वपूर्ण भूमिका निभाई थी यही नहीं रेजिमेंट के जांबाज पैरा कमांडो दुनिया के सबसे खतरनाक सैनिकों में गिने जाते हैं

ग्रेनेडियर्स रेजीमेंट


इस रेजीमेंट को सेना में सबसे शक्तिशाली रेजीमेंट माना जाता है। जब दुश्मन इनके सामने हो तो इनका सिर्फ एक ही ध्येय वाक्य होता है ‘सर्वदा शक्तिशाली’ यानी किसी भी परिस्थिति में मजबूत बने रहना है।

गोरखा रेजीमेंट


गोरखा रेजीमेंट किसी परिचय की मोहताज नहीं है। उनका जयघोष ‘जय महा काली, आयो गोरखाली’ ही दुश्मन में खौफ पैदा करने के लिए काफी है। ‘कायरता से मरना अच्छा’ के साथ अपने टार्गेट को नष्ट करना, अपने लक्ष्य को हासिल करना ही इनका सबसे बड़ा उद्देश्य होता है।

मैकेनाइज्ड इंफ्रेंट्री रेजीमेंट 


भारत-पाकिस्तान युद्ध 1965 के बाद भारतीय सेना को मैकेनाइज्ड इंफ्रेंटी रेजीमेंट की जरूरत महसूस की गई। उसके बाद 1979 में मैकेनाइज्ड इंफ्रेंटी रेजीमेंट की स्थापना हुई। यह 26 बटालियनों में बंटी हुई है जो देश भर में फैली हुई हैं। मैकेनाइज्ड इन्फैन्ट्री रेजिमेंट ने श्रीलंका में ऑपरेशन पवन, पंजाब और जम्मू-कश्मीर में ऑपरेशन रक्षक और जम्मू-कश्मीर में ऑपरेशन विजय में भाग लिया है। यह सोमालिया, कांगो, अंगोला और सियरा लियोन में संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में भी शामिल हुई। भारतीय सेना की मैकेनाइज्ड इंफेंट्री रेजीमेंट को लद्दाख और सिक्किम के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी संचालन के लिए विशेष गौरव प्राप्त है।

पंजाब रेजीमेंट


'जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल' तथा 'बोल ज्वाला माता की जय' का युद्ध घोष करने वाली पंजाब रेजीमेंट भारत के सबसे पुराने फौजी रेजीमेंट में से है। भारत-पाक बंटवारे के समय पंजाब रेजीमेंट का भी बंटवारा हुआ। जिसका पहला हिस्सा पाकिस्तान को मिला, तो दूसरी बटालियन भारत को। पंजाब रेजीमेंट विदेशों में शांति कार्यक्रमों में काफी सक्रिय रही। लोगेंवाला की लड़ाई में पंजाब रेजीमेंट का जौहर हम सभी देख चुके हैं जिसने पाकिस्तानी सेना को धूल चटा दी थी।

मद्रास रेजीमेंट


मद्रास रेजीमेंट भी भारतीय सेना के सबसे पुराने रेजीमेंट में से एक है। 1750 के दशक में अंग्रेजों ने इस रेजीमेंट की स्थापना की थी, जिसके नाम तमाम उपलब्धियां हैं। इस रेजीमेंट में 23 बटालियन हैं। स्वधर्मे निधनं श्रेयः यानी कर्तव्य का पालन करते हुए मरना जिसके लिए गौरव की बात है।ऐसी वीर रेजीमेंट का युद्ध के दौरान केवल एक ही लक्ष्य होता है वीरा मद्रासी, अडी कोल्लु अडी कोल्लु यानी वीर मद्रासी, आघात करो और मारो, आघात करो और मारो !

राजपूत रेजीमेंट


इस रेजीमेंट की शुरुआत सन 1778 में तब हुई,  जब 31वीं रेजीमेंट ( बंगाल नेटिव इनफ़ेंट्री) में तीसरी बटालियन बनी थी। इस बटालियन ने ही हैदर अली से युद्ध में कुड्डालोर पर विजय पाई थी। उनकी इसी बहदुरी के लिए 'विपरीत दिशाओं मे बने कटारों' का राज चिन्ह प्रदान किया गया था, जो आज तक राजपूत रेजीमेंट का बैज है। पहली बटालियन ने दिल्ली के युद्ध में इंपेरियाल कोर्ट में मराठों को परस्त कर दिया था। भरतपुर की घेराबंदी में भी बटालियन सक्रिय थी जिसमें लगभग 400 सैनिकों ने अपनी जान गंवाई और 50 फीसदी घायल हुये थे। सर्वत्र विजय की लाइन के साथ राजपूत रेजीमेंट देश की सेवा करती है।

जाट रेजीमेंट


अंग्रेजों द्वारा 1795 में जाट रेजीमेंट की स्थापना की। जाट रेजीमेंट भारतीय सेना की एक पैदल सेना रेजीमेंट है। यह सेना की सबसे पुरानी और सबसे ज्यादा वीरता पुरस्कार विजेता रेजीमेंट है। रेजिमेंट ने वर्ष 1839-1947 के बीच 19 और स्वंत्रता के पश्चात आठ महावीर चक्र, आठ कीर्ति चक्र, 32 शौर्य चक्र, 39 वीर चक्र और 170 सेना पदक जीते हैं। अपने 200 से अधिक वर्षों के जीवन में, रेजीमेंट ने पहले और दूसरे विश्व युद्ध सहित भारत और विदेशों में अनेक युद्धों में भाग लिया है।

सिख रेजीमेंट


जब भी युद्ध हुआ है तो भारत की सिख रेजीमेंट ने उस युद्ध का करारा जवाब दिया हैं और भारतीय सेना का मान बढ़ाने में अपना भरपूर योगदान दिया है। सिख रेजीमेंट भारतीय सेना की सबसे खतरनाक सेना है। जिसे 72 लड़ाई ऑनर्स, 15 रंगमंच ऑनर्स, 2 परमवीर चक्र, 14 महावीर चक्र, 5 कीर्ति चक्र, 67 वीर चक्र और 1596 अन्य वीरता पुरुस्‍कार  मिले हैं। इस रेजीमेंट से कई अद्वितीय कहानियां जुड़ी हैं। रेजीमेंट की पहली बटालियन अंग्रेजों द्वारा 1846 में सिर्फ सिख साम्राज्य के विलय से पहले बनाई गई थी। सिख रेजीमेंट में 19 बटालियन हैं, जो निश्चय कर अपनी जीत करो के नारे के साथ आगे बढ़ते हैं।

डोगरा रेजीमेंट


अंग्रेजों ने सन 1877 में डोगरा रेजीमेंट की स्थापना की थी। डोगरा रेजीमेंट ने पाकिस्तान के दांत बार-बार खट्टे किए। डोगरा रेजीमेंट को देश के सबसे खतरनाक रेजीमेंट में गिना जाता है।

कुमाऊं रेजीमेंट


अंग्रेजों ने सन 1813 कुमाउं रेजीमेंट की स्थापना की थी।  कुमाऊं रेजीमेंट अब तक 2 परम वीर चक्र, 4 अशोक चक्र, 10 महावीर चक्र, 6 कीर्ति चक्र समेत तमाम पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं। कुमाऊं रेजीमेंट ने तमाम युद्धों में अपना जौहर दिखाया। कुमाऊं रेजीमेंट दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध के मैदान सियाचिन ग्लेशियर में भी तैनात है।

असम रेजीमेंट


असम रेजीमेंट की स्थापना 15 जून 1941 को हुई थी। असम रेजीमेंट में विशेष तौर पर नॉर्थ-ईस्ट से सिपाहियों की भर्ती होती है। असम रेजीमेंट ने चीन हमले के साथ ही बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में भी हिस्सा लिया था।

बिहार रेजीमेंट


बिहार रेजीमेंट की स्थापना 1941 में हुई थी। बिहार रेजीमेंट ने आजादी से पहले बर्मा युद्ध, द्वितीय विश्वयुद्ध में हिस्सा लिया, तो सभी भारत-पाक युद्धों में हिस्सा लिया। बिहार रेजीमेंट ने कारगिल युद्ध में भी दुश्मनों के दांत खट्टे किए। बिहार रेजीमेंट के मेजर संदीप उन्नीकृष्णन ने मुंबई हमलों के समय शहादत दी।

महार रेजीमेंट


महार रेजीमेंट की स्थापना भी सन 1941 में हुई थी। महार रेजीमेंट को 1 परमवीर चक्र, 4 महावीर चक्र समेत तमाम पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। महार रेजीमेंट में देश के सभी कोने से सिपाहियों की भर्ती की जाती है।
नगा रेजीमेंट

नगा रेजीमेंट देश का सबसे नई रेजीमेंट है। नगा रेजीमेंट की स्थापना 1970 में हुई। नगा रेजीमेंट ने अपनी स्थापना के तुरंत बाद बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में हिस्सा लिया। नगा रेजीमेंट ने कारगिल युद्ध के समय द्रास सेक्टर में कमान संभाली। नगा रेजीमेंट को तमाम युद्ध सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।

भारतीय सेना ने सिर्फ बंदूकों के दम पर पाक को दे दी थी शिकस्त, जानें इंडियन आर्मी की 7 खास बातें



पड़ोसी देश द्वारा अवैध घुसपैठ, आतंकवाद, आंतरिक संघर्ष या फिर आपदा, भारतीय सेना ने देश की आवाज को हमेशा बुलंद रखा है और गर्व से चौड़ा सीना। इतना ही नहीं भारतीय सेना ने ऐसा बहुत कुछ जो देश की जनता को दिया है वो हमें गौरवान्वित करता है। फिर चाहे वह दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र पर विजय पताका फहराना हो, ऑपरेशन राहत या फिर बेली ब्रिज का निर्माण... ये नायाब उपलब्धियां सेना के ही नाम दर्ज हैं। भारतीय सेना से जुड़ी ऐसी ही कुछ जानकारियां आज हम आपको बताने जा रहे हैं...

सबसे बड़ी स्वैच्छिक सेना


भारतीय सेना दुनिया की सबसे बड़ी स्वैच्छिक सेना है। ऐसी सेना जिसमें नागरिक अपनी मर्जी से सेना में भर्ती होते हैं।

दुनिया का सबसे ऊंचा युद्ध मैदान


दुनिया के सबसे बड़े युद्धक्षेत्र सियाचिन ग्लेशियर पर भारत का नियंत्रण है। यह स्थान समुद्र तल से पांच हजार मीटर की ऊंचाई पर है। यहां पर भारत-पाकिस्तान के बीच साल 1984 से वर्चस्व की जंग चल रही है। यहां अमेरिका, ब्रिटेन और रूस की विशेष ऑपरेशन टीमें प्रशिक्षण लेने आती हैं। यहां तक कि जब अमेरिका को अफगानिस्तान पर हमले के दौरान जब अपने स्पेशल फ़ोर्स की तैनाती करनी थी तो उनको ट्रेनिंग इसी HAWS में दिलाई गई थी।

दुनिया का सर्वोत्कृष्ट मिलिट्री ट्रेनिंग सेंटर


भारतीय सेना का हाई एल्टीट्यूड वारफेयर स्कूल (HWS) दुनिया के सर्वोत्कृष्ट सैन्य प्रशिक्षण केंद्रों में से एक है। यह जम्मू कश्मीर के गुलमर्ग में स्थित है।

'बैटल ऑफ लोंगेवाला'


भारत-पाकिस्तान के बीच 1971 में लोंगेवाला की लड़ाई लड़ी गई थी। इसमें भारत के पास M-40 राइफल और एक जीप के साथ महज 120 सैनिक थे, जबकि पाकिस्तान के पास दो हजार सैनिक, 45 टैंक और एक मोबाइल इंफैंट्री ब्रिगेड थी। इस लड़ाई में केवल दो भारतीय जवान हताहत हुए थे।

ऑपरेशन राहत


2013 में उत्तराखंड में आई बाढ़ से प्रभावित नागरिकों को निकालने व सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने के लिए 'इंडियन एयरफोर्स' ने दुनिया का सबसे बड़ा अभियान चलाया था।

एशिया की सबसे बड़ी नेवल एकेडमी


ये एकेडमी केरल में है और एशिया में अपनी तरह की सबसे बड़ी एकेडमी है। यह 12 साल में बनकर तैयार हुई। इसकी लागत 721 करोड़ रुपये आई।

बेली ब्रिज


ये दुनिया का सबसे ऊंचा ब्रिज है। यह हिमालय पर्वत में द्रास और सुरू नदियों के बीच लद्दाख घाटी में स्थित है। भारतीय सेना की इंजीनियरिंग विंग ने इसे 1982 में बनाया था।

PICS : मैकेनिक से लेकर पायलट तक 'दूसरे विश्व युद्ध' में महिलाओं ने निभाई थी खास भूमिका, देखें 10 तस्वीरें


अक्सर कहा जाता है कि महिलाएं कम शक्तिशाली होती हैं। लेकिन हम आपको जो तस्वीरें दिखाने जा रहे हैं उनसे आप यह अंदाजा लगा सकेंगे कि 19वीं सदी की महिलाएं 20वीं सदी की महिलाओं से किसी भी रूप में कम नहीं थी। या यूं कहें कि उनसे भी आगे थीं। द्वीतीय विश्व युद्ध के दौरान जहां दुनिया भर के पुरुष जंग के मैदान में उतर रहे थे। वहीं ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और अमेरिका जैसे देशों की महिलाएं युद्ध में उनकी हर संभव सामरिक सहायता कर रही थीं। चाहे बात मैकेनिक के रूप में मशीनों को ठीक करने की हो, बन्दूक तानकर दुश्मन को उडाना हो या फिर नर्स के रूप में घायल सैनिकों का जीवन बचाना हो। उन्होंने पुरुषों के ही समान कंधे से कंधा मिलकर काम किया। आइये देखते हैं आखिर द्वीतीय विश्व युद्ध में क्या थी महिलाओं की भूमिका :-

हर काम में परफेक्ट


एयरक्राफ्ट के स्टाम्प डिजाइन पर रोगन करती एक महिला वर्कर। 

उड़ाए विशाल एयरक्राफ्ट


तकरीबन 350,000 अमेरिकी महिलाओं ने वर्दी में अपनी सेवाएं दीं। इन महिलाओं को उस समय बनाई गई women's Auxiliary Corps में भर्ती किया गया था।

युद्ध के मैदान में नहीं हटी पीछे


महिलाओं के कार्यों में बड़ी मशीनें ठीक करने से लेकर सेना के सामान को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना भी शामिल था। 

बचाई घायल लोगों की जिंदगी


जंग के दौरान घायल हुए सैनिकों  के लिए महिलाओं ने नर्स के रूप में बहुत बड़ी भूमिका निभाई। मोर्चे पर घायलों को चिकित्सा मुहैया शायद सबसे महात्वपूर्ण भी था जिसे महिलाओं ने बखूबी निभाया।   

मोटरसाइकिल मैसेंजर


द्वीतीय विश्वयुद्ध में पुरूष जहां मोर्चे पर तैनात थे। वहीँ महिलाएं मोटरसाइकिल मैसेंजर के रूप में संदेशवाहक का कार्य भी कर रहीं थीं। सेना के ऑफिशियल कार्यों के लिए पश्चिमी देशों ने बड़ी संख्या में नियुक्त किया गया।   

एयरक्राफ्ट इंजीनियर


यह तस्वीर 1942 की है। जिसे होवार्ड आर. होल्लेम ने अक्टूबर माह में खींचा था। 

वूमेन ऑफ स्टील


बड़ी मशीनों की मैकेनिक भी रही हैं महिलाएं। एक एयरक्राफ्ट के निर्माण में व्यस्त वार-वूमेन।

मिलती थी इतनी तनख्वाह


मशीनों की मरम्मत, जहाजों के निर्माण व सामान की देख-रेख जैसे इन कठिन कार्यों के लिए महिलाओं को एक घंटे के 56 सेंट्स दिए जाते थे। 

तेज दिमाग


युद्ध का सामान बनाने की फैक्ट्री में मशीनों को बारीकी से जांच-पड़ताल करती एक महिला वर्कर। 

युद्धकौशल का प्रशिक्षण


कोम्बेट रोल में भी महिलाओं ने द्वीतीय विश्व युद्ध के दौरान महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन तस्वीरों में आप देख रहे हैं  बाधाओं को पार करने और बन्दूक चलाने का प्रशिक्षण लेती महिलाएं।