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Wednesday, March 4, 2020

बहुत खलता है ......., एक खूबसूरत ​रिवायत का यूं मर जाना...!


एक समय था जब होली के त्योहार में प्राकृतिक रंगों के साथ एकता, भाईचारे और सौहार्द के रंग भी मिले होते थे। आज न ही वो आपसी सौहार्द है और न ही त्योहारों में वो खूबसूरती। न जाने कितनें ही त्योहारों की पुरानी परंपराएं विलुप्त होती जा रहीं हैं, मैनें भी अपने सामने होली की एक खूबसूरत परंपरा को इसी तरह मरते देखा है.......।
photo: google

ये 90 के दशक की बात है। मैं और मेरी बहन दोनों के लिए हर बार होली आने से चार दिन पहले ही मां नए कपड़े खरीदकर ले आती थीं। हम जब तक उन्हें छूकर नहीं देख लेते तब तक हमें यकीन नहीं होता ये सोचकर कि कहीं मां होली वाले दिन हमें पुराने कपड़े न पहना दें।
नई ड्रेस के बाद मां का दूसरा काम था लकड़ी की उस कश्मीरी टोकरी को निकालना, जिसे वह अपनी अलमारी में सहेज कर रखती थीं। उधर, इस टोकरी को फूलों से भरने की हमारी जद्दोजेहद एक दिन पहले ही शुरू हो जाती थी। इस दिन की खुशी अलग ही होती थी, क्योंकि इस दिन पापा के साथ अपने खेतों पर जाने का मौका जो मिलता था।
जितनी देर पापा खेत पर होते, तब तक दूर तलक फैली सरसों के न जानें कितने खूबसूरत पीले फूलों को बटोर लिया जाता। लेकिन सिर्फ पीले से काम कहां चलता, बालमन को तो नीला, गुलाबी, हरा सभी रंग के फूलों की ललक रहती। इसके लिए सड़कों पर खड़े पलाश, कनेर, अनार और कचनार जैसे पेड़ काफी थे। चिल्ला- चिल्लाकर पापा से ट्रैक्टर रोकने को कहते और ..धम्म से कूदकर सुर्ख फूलों को चुन लाते। हां, इस पूरी प्रक्रिया में पापा को अन्य दिनों की अपेक्षा लेट हो जाता था। जाहिर है बच्चों की जिद के आगे आखिर हर पिता को झुकना ही पड़ता है।
घर पहुंचने तक के रास्ते में यदि किसी के घर के बाहर गुलाब खिले दिख गए तो कहना ही क्या? फिर से ट्रैक्टर रुकवाया और झट से दो-चार सुर्ख और गुलाबी गुलाब झपट लिए। कई बार इस मुश्किल काम में कांटों ने नन्हीं उंगलियों को चीरा भी। सब चलता था, क्योंकि एक हनक थी कि होली की बच्चा पार्टी में हमारे पास सबसे ज्यादा और खबूसूरत फ्लावर्स होने चाहिए। अब रात भर फूलों को सही सलामत रखने की जिम्मेदारी मां की होती।
सुबह होते ही फूलों को बिचूरकर टोकरियों में रखने की तैयारी शुरू हो जाती। दोपहर को तीन बजते ही मां हम दोनों को नई ड्रेस पहनाकर तैयार कर देती और फूलों की टोकरी हाथों में थमा देती। साथ ही ये भी समझा देती कि शैतानी में चोट न मार लेना! पूरे गांव में घूमकर पांव न दुखा लेना! घर वापस आने में ज्यादा देर न कर देना, आदि।
सारी तैयारियों के बाद अब किससे सब्र होता, मां इजाज़त दे और हम अपनी फ्रेंड्स को लेने उनके घर पहुंच जाएं। लेकिन मां के मुताबिक बाकी लड़कियों को तुम्हारे घर आने दो, तब उनके साथ निकल जाना।
चूड़ियां खनकाती, हाथ में फूलों से भरी टोकरियां लिए चहचहाती छोटी लड़कियों का शोर जैसे ही घर तक पहुंचता, सभी घरवाले निकलकर आंगन में आ जाते। सारी बच्चियां घर के सदस्यों पर अपनी-अपनी टोकरियों से फूल बिखेरतीं और हैप्पी होली बोलकर विश करतीं।
यहां से हम भी टोली में जुड़ जाते और गांव में घूमते हुए हर घर में जाकर सबको नमस्ते करते..., फूल बिखेरते..., हैप्पी होली बोलते और निकल जाते...। इस दौरान घर के लोगों की उन बच्चों से भी पहचान हो जाती जिन्हें वे अब तक नहीं पहचानते थे। कोई प्यार से गोद में उठा लेता तो कोई तरह-तरह की मिठाइयां परोस देता। कोई सौ सवाल पूछता। कोई मस्ती में डराने की काशिश करता, तो कोई पढ़ाई का स्टेटस चैक करने लग जाता।....और इस तरह शाम हो जाती और हम घर लौट आते।
ये एक खूबसूरत तरीका था समाज को, लोगों को जानने का, रिश्तों की पहचान करने का, संस्कारों को जीने का। ये एक खूबसूरत याद थी जो आज भी हमारे दिलों में जिंदा है। ये एक खूबसूरत परंपरा थी जिसका अनायास ही मिट जाना बड़ा खलता है। अब गांव में होली पर किसी का घर लाड़लियों की रंग-बिरंगी टोकरियों से गिरे उन फूलों से नहीं महकता, अब लड़कियों की टोली फूलों से त्योहारों की मुबारकबाद देने नहीं जाती।
आज समय बदला चुका है, हम कहते हैं कि हमने विकास किया है लेकिन उस विकास की प्रक्रिया में समाज के चेहरे को नकारात्मकता के साथ बदल दिया है। मुझे नहीं लगता कि आज कोई भी मां-बाप अपनी पांच या दस साल की बेटी को अपने पड़ोसी के यहां बेखौफ भेज दें, या इस तरह बच्चियां आजादी से किसी के घर जाकर एक-दूसरे को विश कर सकें। हमने अपने बच्चों के लिए कैसा माहौल बना दिया है ?
सवालों के जवाब हमारे ही पास हैं बदलना भी हमें ही है। ये बेहद खूबसूरत परंपरा जिस तरह विलुप्त हो गई इसी तरह न जानें और भी कितने ही ट्रेडिशन खत्म होने की कगार पर हैं या हो चुके हैं, जिन्हें सहेजकर रखने में हम सभी को सहयोग करने की जरूरत है। आज भी जब होली का जिक्र होता है तो वह अनमोल दिन कभी नहीं भूलता। बस कुछ बाकी है तो खूबसूरत यादें, जो आपको ताजगी देती हैं, ऊर्जा देती हैं।

Friday, February 7, 2020

'रॉयल इनफील्ड' से है भारतीय सेना का पुराना नाता, इस मिलिट्री ब्रांड से जुड़ी 11 बातें


'रॉयल इनफील्ड' और भारतीय सेना एक दूसरे से अनजान नहीं हैं या यूं कहें कि यानी बुलेट का सेना से बहुत पुराना संबंध है। यहां तक कि विश्व युद्ध के दौरान भी इस मोटरसाइकिल का इस्तेमाल किया गया और आज तक भी यह बाइक कई देशों की सेनाओं की पहली पसंद है। आजादी के बाद से बुलेट ने सैन्य बाइक के रूप में देश में एक अलग पहचान बनाई और आज बुलेट न सिर्फ सेना बल्कि आम लोगों के लिए भी स्टेटस सिम्बल बनी हुई है। आखिर आम लोगों में क्यों खास है और क्यों सेना की शान है बुलेट। आइये जानते हैं कुछ खास और रोचक बातें :

 छोटे बिजनेस से शुरू हुई थी कम्पनी


ब्रिटिश कम्पनी रॉयल एनफील्ड ने दरअसल, शुरुआत में एक हथियार बनाने वाली कम्पनी के रूप में बिजनेस शुरू किया था जिसकी 'एनफील्ड राइफल' काफी प्रसिद्ध थी। बाद में इसने साइकिल  व कार बनाना शुरू किया और इसे साइकिल कम्पनी के नाम से भी पहचाना जाने लगा।

इन्होने बनाई थी पहली बुलेट  


इस कम्पनी की पहली  मोटरसाइकिल सन 1885 में गॉटलीब डेमलर और विल्हेम मेबैक द्वारा जर्मनी में बनाई गई थी। इसे एक रेटवगेन (सवारी कार) कहा जाता था और यह पहला गैस संचालित वाहन था।'एनफील्ड राइफल' को ट्रिब्यूट करते हुए इस बाइक का नाम बुलेट रखा गया और इसका लोगो भी बुलेट जैसा डिजाइन किया गया।  

विश्व युद्ध से भी जुड़ा है बुलेट का इतिहास


सन 1909 में इस कम्पनी ने बुलेट मोटरसाइकिल बनानी शुरू की लेकिन यह कम्पनी ब्रिटेन नहीं बल्कि रूस को युद्ध के लिए बाइक बनाकर देती थी। रॉयल एनफील्ड ने बुलेट को साइड कार के साथ डिजाइन किया। जिसका प्रयोग प्रथम व द्वीतीय विश्व युद्ध में आर्मी मशीनगन के लिए प्रयोग करती थी। इसे हिंदी फिल्म 'शोले' में भी दर्शाया गया।

भारतीय सेना से खास संबंध


भारतीय सेना के साथ रॉयल एनफील्ड का इतिहास सन 1949 में शुरू हुआ, जब सरकार ने रॉयल एनफील्ड की बुलेट को देश की सीमा पर   गश्ती उपयोग के लिए बनाने का आदेश दिया था। तब से आज तक 'रॉयल एनफील्ड' ने भारतीय सेना के साथ एक संबंध बरकरार रखा है। 'रॉयल एनफील्ड बुलेट' इकलौती ऐसी बाइक है जिसे भारतीय सेना में  इस्तेमाल किया जाता है।

कम्पनी ने भारत में मद्रास मोटर्स के साथ किया था टाईअप


सन 1949 के दौरान जब भारतीय सेना के अधिकारियों ने बुलेट का परीक्षण किया तो उन्हें लगा कि पिछले वाहन की तुलना में यह काफी बेहतर है। इस तरह ब्रिटिश निर्माता कम्पनी को भारत सरकार से अपना पहला ऑर्डर मिला और उसने मद्रास मोटर्स के साथ मद्रास (चेन्नई) में एनफील्ड इंडिया के रूप में एक कारखाना खोला।

भारत-पाक बॉर्डर पर तैनात की गई थी पहली बुलेट


सन 1952 में भारतीय सेना ने कम्पनी से तकरीबन 800 रॉयल एनफील्ड बुलेट मोटरसाइकिल खरीदीं। इसके दो साल बाद रॉयल एनफील्ड कंपनी ने सन 1955 में भारत में इनका निर्माण करना शुरू किया। इनमें से कुछ बुलेट् को पंजाब में भारत-पाक सीमा पर गश्त के लिए लगाया गया था।

भारतीय वायुसेना के सम्मान में लॉन्च की है 'ब्लू बुलेट'


'रॉयल एनफील्ड' बुलेट बाइक्स बनाने के लिए भारत में  मशहूर है। एनफील्ड की क्लासिक 500 स्कावड्रन नीले कलर की बुलेट भारतीय वायुसेना के सम्मान में लॉन्च की गई है। यह काफी स्टाइलिश और क्लासिक है।

बुलेट का सबसे ज्यादा बिकने वाला मॉडल


सन 1995 में रॉयल एनफील्ड का बुलेट 350 CC बुलेट बनाई। यह कम्पनी का सबसे ज्यादा समय तक चलने वाला मॉडल है जो सन 1995 से  आज तक भी काफी डिमांड में है। कम्पनी ने इस मॉडल की 20,000 बुलेट्स मोटरसाइकिलों का प्रतिवर्ष निर्माण किया था। यह बाइक सेना के सभी मानदंडों पर खरी उतरती है।
भारतीयों की पहली पसंद

सन 1990 के बाद अन्य दोपहिया निर्माताओं ने भी भारतीय बाजार में अधिक एडवांस व्हीकल का उत्पादन करना शुरू कर दिया। लेकिन  भारतीय सेना 'रॉयल एनफील्ड' के साथ बनी रही और अभी भी इन मोटरसाइकिलों का उपयोग कर रही है। लम्बे समय तक राष्ट्र को सेवा देने वाली टीम के साथ इतने सालों का संबंध, ब्रांड के लिए एक देशभक्ति की भावना भी जोड़ता है। यही कारण है कि आप गणतंत्र दिवस परेड जैसे राष्ट्रीय अवसरों पर हैरतंगेज़ स्टंटों के लिए रॉयल 'एनफील्ड' बाइक का उपयोग करते हुए भारतीय सैनिकों को देखते हैं।

 भारत सहित 45 देशों में है बुलेट का जलवा  


'रॉयल एनफील्ड' भारत के साथ साथ अमेरिका, जापान, दक्षिण अमेरिका जैसे 45 अन्य देशों के लिए भी मोटरसाइकिलों का निर्यात करता है। यही नहीं, यह  बाइक इतनी विश्व प्रसिद्ध है कि अभी तक जितनी हर्ले डेविडसन बाइक पूरी दुनिया में बेंची गई हैं उससे कहीं ज्यादा बुलेट  अकेले भारत में बेंची गई हैं।

लोगों में आज भी बरकरार है बुलेट का क्रेज  


सन 1970 में 650 सीसी 700 सीसी की बाइक भी बाजार में उतारी लेकिन इसकी मांग न होने के कारण कम्पनी ने इसका निर्माण बंद कर दिया। इसके अलावा एक डीजल से चलने वाली बाइक भी बनाई जो सफल नहीं हुई और कम्पनी को इसका भी उत्पादन बंद करना पड़ा। खैर ! 'रॉयल एनफील्ड' बुलेट अपनी मजबूती, अपने आकर्षण और खास डिजाइन के लिए प्रसिद्ध है यही कारण है सेना के साथ-साथ आम युवाओं में भी इसका क्रेज आज भी बरकरार है।

Thursday, March 22, 2018

जब भारतीय सैनिकों के लिए अस्पताल में बदल दिया गया था इंग्लैण्ड का यह 'शाही पैलेस'

आज हम आपको बता रहे हैं कि कैसे प्रथम विश्व युद्ध के दौरान,इंग्लैण्ड के एक शाही पैवेलियन को ब्रिटिश भारतीय सेना के घायल हुए सैनिकों के लिए एक अस्पताल के रूप में परिवर्तित कर दिया गया था। और यह ब्रिटेन में सबसे प्रसिद्ध सैन्य अस्पतालों में से एक बन गया। सन 1914 से 1916 तक यह पश्चिमी मोर्चे पर युद्धक्षेत्र में घायल हो गए भारतीय सैनिकों के लिए इस्तेमाल किया गया था। इसके बाद 1916 से 1920 तक यह पैवेलियन उन ब्रिटिश सैनिकों के लिए एक अस्पताल के रूप में इस्तेमाल किया गया था जिन्होंने युद्ध में हाथ या पैर खो दिए थे।

पश्चिमी मोर्चे पर डटे थे भारतीय सैनिक


प्रथम विश्व युद्ध के शुरुआती कुछ महीनों में ब्रिटिश भारतीय सेना ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पश्चिमी मोर्चे पर फ़्रांस में भयंकर युद्ध में डटी हुई भारतीय सेना के सैनिक बड़ी संख्या में हताहत हो रहे थे जिन्हें चिकित्सकीय सुविधाओं की तत्काल आवश्यकता थी लेकिन फ़्रांस में न तो सुविधाएं और न ही कोई विशेषज्ञता थी। इसलिए उन्हें वहां से इंग्लैण्ड लाने की योजना बनाई गई।

हॉस्पिटल में तब्दील कर दिए गए ब्राइटन के तीन स्थान


ऐसे में ब्राइटन को घायल और बीमार भारतीय सैनिकों की देखभाल के लिए समर्पित किया गया और इसे सैन्य अस्पतालों के परिसर के स्थान के रूप में चुना गया था। इस उद्देश्य के लिए शहर के अधिकारियों द्वारा तीन भवनों को दिया गया: वर्क हाउस (जिसका नाम बाद में Kitchener अस्पताल में बदला गया), द यॉर्क प्लेस स्कूल और रॉयल पैवेलियन। इन तीन स्थानों को सैन्य अस्पताल परिसर के रूप में इस्तेमाल किये जाने के लिए तैयार किया जाने लगा।

ब्राइटन का पहला भारतीय सैनिकों के लिए अस्पताल


ब्राइटन में सैनिकों के लिए खुलने वाला रॉयल पैविलियन भारतीय सैनिकों के लिए पहला अस्पताल था। इसके दो महल डोम और कॉर्न एक्सचेंज (एक ऐसी इमारत थी जहां किसानों और व्यापारियों ने अनाज का कारोबार किया) दो सप्ताह से भी कम समय में चिकित्सा सुविधा के रूप में परिवर्तित हो गए थे।

2,300 से भी ज्यादा मरीजों का हुआ इलाज


यहां नई पाइपलाइन और शौचालय की सुविधा स्थापित की गई, और नए वार्डों में 600 बिस्तरों की स्थापना की गई। यही नहीं, एक्स-रे उपकरण भी स्थापित किए गए royal पैलेस कि आलीशान रसोई को दूसरा ऑपरेटिंग थिएटर बना दिया गया। दिसंबर 1914 की शुरुआत में इस पैवेलियन में मरीजों का आना शुरू हुआ। इसके अगले ही वर्ष तकरीबन 2,300 से अधिक भारतीय सैनिक मरीजों का यहां इलाज हुआ।

सैनिकों का रखा गया विशेष ध्यान


ख़ास बात यह भी थी कि अस्पताल को न केवल सैनिकों की चिकित्सा आवश्यकताओं की देखभाल के लिए डिज़ाइन किया गया था बल्कि मरीजों की धार्मिक सांस्कृतिक और खानपान जरूरतों के लिए भी विशेष सुविधाएं दी गईं।

लॉन में बनाई गईं थीं नौ रसोईयां


खुले मैदान में ही नौ रसोईयां बनाईं गईं। पूर्वी लॉन में प्रार्थना के लिए जगह बनाई गई।

मृतकों के अंतिम संस्कार की थी अलग व्यवस्था


ब्राइटन अस्पतालों में मारे गए उन भारतीय सैनिकों के लिए भी विस्तृत व्यवस्था की गई,जिनमें से 18 का रॉयल पैवेलियन में इलाज के दौरान निधन हो गया था। सिखों और हिंदुओं को पचाम के पास खुली हवा में अंतिम संस्कार के लिए एक स्थल प्रदान किया गया था और मुस्लिमों को वोकिंग में बने एक कब्रिस्तान की कब्र में दफनाया गया था।

अब अस्पताल नहीं है यह 'रॉयल पैलेस'


बाद में 1915 में ब्रिटिश ने मध्य-पूर्व में भारतीय सेना की तैनाती करने का निर्णय लिया और ज्यादातर भारतीय सैनिकों को यूरोप से वापस बुला लिया गया। नतीजतन, ब्राइटन के भारतीय अस्पतालों को धीरे-धीरे बंद कर दिया गया। जनवरी 1916 में इस पैवेलियन को पूर्ण रूप से बंद कर दिया गया। अप्रैल 1916 में, ब्रिटिश विकलांगों के लिए एक अस्पताल के रूप में इसे फिर से खोला गया। और इस अस्पताल में ऐसे 6000 सैनिकों का उपचार किया गया जिन्होंने युद्ध के दौरान हाथ या पैर खो दिए थे।

विरासत के रूप में संजोया गया है रॉयल पैविलियन


वर्तमान में इसे एक विरासत के रूप में संजोया गया है रॉयल पैविलियन इंग्लैंड में राजकुमार रीजेंट, बाद में किंग जॉर्ज IV ने 1787 और 1823 के बीच निर्मित करवाया था। यह अपने अदभुत वैभव और वास्तुशिल्प कला रोमांचक खूबसूरती और संस्कृति की उम्दा मिसाल है। अपनी बाहरी भव्य वास्तुकला से यह शाही पैलेस भारत में मुगल काल की किसी मस्जिद या महल के सामान नजर आता है।

Wednesday, March 21, 2018

उत्तर प्रदेश पुलिस का यह मानवीय चेहरा देखकर आप भी करेंगे 'सलाम,' देखें 7 तस्वीरें

यूपी पुलिस अपनी इमेज को लेकर अक्सर सुर्खियों में  रहती है। लेकिन इस बात में भी कोई शक नहीं कि यूपी पुलिस अपनी छवि बदलने  को लेकर लगातार प्रयासरत है। कहने को जनता भले ही यूपी पुलिस को दबंग पुलिस के रूप में जानती हो लेकिन उत्तरप्रदेश पुलिस का एक और मानवीय चेहरा भी है जिसे हम कम ही देख पाते हैं। आज हम जो तस्वीरें आपके लिए लाएं हैं उन्हें देखकर आपको भी यूपी पुलिस पर गर्व होगा:-

ऑन ड्यूटी 'नायक'


उत्तरप्रदेश पुलिस के हेड कॉन्स्टेबल भूपेंद्र सिंह तोमर ने फर्ज अदायगी की एक मिसाल पेश की। यूपी 100 पर तैनात भूपेन्द्र अपनी ड्यूटी पर थे कि उन्हें दो फोन आए। पहले फोन पर एक लड़के के घायल होने कि खबर मिली और दूसरे पर उनकी नवविवाहिता बेटी कि एक्सीडेंट में हुई मौत की खबर मिली लेकिन उन्होंने अपनी ड्यूटी को पहले चुना और घायल लड़के  को अस्पताल पहुंचाया उन पर हाल ही में 'On Duty' नाम से एक डॉक्युमेंट्री फिल्म भी बनाई गई है।

मानवता की मिसाल


ये हैं नीमगांव खीरी के इंस्पेक्टर संजय सिंह जिन्होनें मानवता की एक और मिसाल पेश की। हाल ही में उनके थाने में एक गरीब फरियादी अपनी पत्नी व बच्चों के साथ पहुंचा, बच्चों की दशा देख इंस्पेक्टर संजय सिंह ने तुरन्त बच्चों के लिए कपड़े व चप्पल मंगाकर उन्हें पहनाए और पूरे परिवार को मदद का भरोसा दिया।

किसी जिन्दगी के लिए



उन्नाव जनपद की बांगरमऊ कोतवाली मे तैनात पुलिस कर्मी  प्रमोद व तरूण  को जैसे ही यह मालूम चला कि घायल बच्ची को रक्त की जरुरत है तो वे रक्तदान के लिए तुरंत दौड़ पड़े। वह बच्ची दुर्घटना में घायल हो गई थी।

बुजुर्ग को मिला जीवनदान


व्यक्तिगत और पारिवारिक परेशानियों से तंग आकर एक वृद्ध आगरा फ़ोर्ट रेलवे स्टेशन पर आ रही ट्रेन के सामने पटरी पर लेट गए। यह देखकर वहां  ड्यूटी पर मौजूद कॉन्स्टेबल  विकल, रामपाल सिंह और रंजीत शर्मा ने तुरंत पटरियों पर कूदकर वृद्ध की जान बचायी। इन तीनों आरक्षियों को इस साहसिक कार्य के लिए इनाम भी दिया जा चुका है।

सौहार्द व भाईचारे की एक अनोखी मिसाल


ये तस्वीर उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले की है। 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों का दाग़ मिटाने और पूरे UP में हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द स्थापित रखने की दिशा में यूपी पुलिस का यह कदम  सराहनीय है। यहां होली के अवसर पर थाना प्रभारी सहित वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने एक अनोखी पहल करते हुए मदरसों के बच्चों को अपने हाथ से भोजन परोसा और उनके साथ  खाना खाकर भाईचारे की एक अनोखी मिसाल पेश की। इसमें बच्चों के साथ-साथ मदरसे के वरिष्ठ  लोग भी शामिल हुए।  

पुलिस अफसर की नायाब पहल


साथ बैठे पुलिस अंकल, बच्चों का बदलेंगे कल ।जी हां यह तस्वीर है चंदौली पुलिस के डीएसपी त्रिपुरारी पांडे की। नक्सल प्रभावित इलाके में इस अधिकारी ने बच्चों की शिक्षा का बीड़ा उठाया है यहां उन्होंने 200 परिवारों के बच्चों को सफाई का पाठ पढ़ाया, टॉफियां व किताबें बांटी और नाई बुलवाकर उनके बाल भी कटवाए। यही नहीं अब ये बच्चे हर रोज स्कूल जाते हैं।

दुःख के साथी


यह तस्वीर लखनऊ में हुई भीषण दुर्घटना के दौरान की है। जहां कई लोग घायल हुए इनमें कई बच्चे भी शामिल थे।पुलिस ने जरा भी देरी न करते हुए घायल बच्चों को अस्पताल पहुंचाया।    

सुरक्षा से शिक्षा तक


SP मिर्जापुर के मार्गदर्शन में गठित नक्सल प्रभावित गांव भवानीपुर, हिनौता, भीटी में ग्रीन ग्रुप की महिलाओं को आत्मरक्षा हेतु प्रशिक्षण दिया गया। पुलिस के सहयोग से उत्तर प्रदेश की यह ग्रीन ब्रिगेड अब बदमाशों को सबक सिखाने और किसी भी वक्त अपनी सुरक्षा करने के लिए तैयार है।

Tuesday, March 20, 2018

बकरी और बाज से लेकर नेवले तक, ये हैं विदेशी सेनाओं के शुभंकर

-dimple sirohi
पुराने समय से ही आर्मी की अलग-अलग यूनिट्स में विभिन्न जानवरों को शुभंकर के रूप में रखा जाता है। शुभंकर या यूं कहें कि भाग्यशाली। ये पशु या जानवर सैन्य इकाई का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं और प्राचीन समय से ही विभिन्न सैन्य इकाइयों की पहचान बने रहे हैं। पहले और दूसरे विश्वयुद्ध कि कई तस्वीरें इस बात का प्रमाण हैं कि कुत्ते, बन्दर, भालू, कछुए व खरगोश आदि जानवरों को सैन्य टुकडियां अपने साथ रखती थीं। कुछ सेनाओं में आज भी  इन्हें यूनिट के लिए भाग्यशाली माना जाता  है। कई देशों की सेना में आज भी एनिमल्स को शुभंकर के रूप में रखा जाता है आइये जानते हैं इनसे जुड़ी कुछ ख़ास बातें :-

लिटिल पोनी



स्कॉटलैंड की रॉयल रेजिमेंट में एक छोटे आकार का (pony) टट्टू है। नाम है र्पोरल क्रूचान IV। उसे हर सैन्य आयोजन में रेजीमेंट के शुभंकर के तौर पर प्रदर्शित किया जाता है।ख़ास बात यह है कि उसके कई प्रमोशन भी हो चुके हैं। 

मिस्टर लिलवेलिन



ब्रिटिश 'द रॉयल वेल्श' की दूसरी बटालियन का शुभंकर है एक बकरा जिसका नाम है लिलवेलिन और उसे फ़्यूसिलियर(a member of any of several British regiments) का पद प्राप्त है। बकरियां सेना में बहुत लोकप्रिय हैं।

लांस कॉर्पोरल डर्बी XXX


ब्रिटिश सेना के मेर्सियन रेजिमेंट में एक मेंढा (बकरी) भी है - लांस कॉर्पोरल (a rank of non-commissioned officer) डर्बी XXX

लांस कॉर्पोरल बॉबी


'बॉबी'  द रॉयल वार्विकशायर फ्यूसिलियर्स लांस कॉर्पोरल ।

'द आयरिश गार्ड्स'


'द आयरिश गार्ड्स' का ऑफिशियल शुभंकर, Wolfhound Domhnall of Shantamon

सर नील्स ओलाव


सर नील्स ओलाव एक किंग पेंगुइन है। वह नॉर्वे के किंग्स गार्ड के कर्नल-इन-चीफ भी है। इस तस्वीर में आप देख सकते हैं कि वह अपने सैनिकों का निरीक्षण कर रहा है।

समझदार नेवले


ब्रिटिश आर्मी की यार्कशायर रेजीमेंट का शुभंकर बेहद छोटे दिखने वाले नेवले हैं। इन्हें बाकायदा सेना की ट्रेनिंग देकर समझदार बनाया जाता है और फिर रैंक और तनख्वाह भी दी जाती है।

Lance Corporal Pegasus V


लांस कॉर्पोरल पेगासस पांचवा ब्रिटिश सेना के पैराशूट रेजीमेंट का शुभंकर है। पोनी मेजर नाम के एक व्यक्ति द्वारा इसकी देखभाल की जाती है।

रेंजर USA


संयुक्त राज्य अमेरिका की सैन्य अकादमी के पश्चिम प्वाइंट में दो खच्चर शुभंकर हैं। यहां उनकी रैंक हैं - रेंजर III और स्ट्रेकर।

Quintus Rama The Tiger


रॉयल ऑस्ट्रेलियाई रेजिमेंट की 5 वीं बटालियन में उनके शुभंकर के रूप में क्विंटस राम नामक बाघ को रखा गया है। इस तस्वीर में आप उसे पिंजरे में देख रहे हैं क्योंकि सैन्य परेडों के आसपास उसके रहने के लिए पिंजरे में लाया जाता है।

साहसी शिकारी


ऑस्ट्रेलियाई कैवलरी रेजिमेंट में एक फैली-पूंछ वाला ईगल शुभंकर है, जिसे साहस के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। ऑस्ट्रेलिया में फैली हुई पूंछ वाले बाज सबसे बड़े शिकारी पक्षी हैं।

शुभंकर कंगारू


ऑस्ट्रेलियाई सेना का शुभंकर सबसे कूल है। पुराने जमाने की इस तस्वीर में मिस्र में ऑस्ट्रेलियाई इंपीरियल फोर्स की 9वीं तथा 10वीं बटालियन अपने शुभंकर कंगारू के साथ नजर आ रही हैं।

शुभंकर एक बकरी


संयुक्त राज्य अमेरिका की नौसेना अकादमी का शुभंकर भी एक बकरी है।

Monday, March 19, 2018

शांतिकाल के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार 'अशोक चक्र' से जुड़ी ये 5 अहम बातें


शौर्य, पराक्रम, वीरता, साहस और अदम्य उत्साह से भरे अनेक वीरों सपूतों ने देश के लिए अपना सर्वस्व कुर्बान कर दिया। कितने ही देश भक्तों ने बिना अपनी जान की परवाह किए ज़रुरत पड़ने पर जानलेवा हालात का सामना किया। ऐसे ही वीरों के जज्बे को सराहने के लिए अनेक वीरता पुरस्कार भी दिए जाते है। 69वें गणतंत्र दिवस के मौके पर यह पुरस्कार वायुसेना के गरुड़ कमांडो ज्योतिप्रकाश निराला को मरणोपरांत प्रदान किया गया वह जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए थे। आज हम आपको शांतिकाल के इस सबसे बड़े वीरता पुरस्कार 'अशोक चक्र' से जुड़े कुछ अहम बातें बताने जा रहे हैं:

अशोक चक्र भारत का शांतिकाल का सबसे बड़ा सैन्य सम्मान


जिस तरह परमवीर चक्र युद्धकल का सबसे बड़ा सैन्य सम्मान है, उसी तरह ही अशोक चक्र भारत का शांतिकाल का सबसे बड़ा सैन्य सम्मान है। ये सम्मान उन लोगों को दिया जाता है जो ज़रुरत पड़ने पर अतुल्य साहस और बहादुरी का परिचय देते है।

आम नागरिक भी अशोक चक्र से सम्मानित किए जाते हैं


ज़रुरत पड़ने पर हिम्मत और जज्बे भरे कार्य को अंजाम देने पर सुरक्षाकर्मियों के अलावा आम नागरिकों को भी अशोक चक्र से सम्मानित किया जाता है। भारतीय नीरजा  भनोट को  भी अशोक चक्र प्रदान किया जा चुका है । अपनी जान की परवाह न करते हुए 23 वर्षीय नीरजा ने 380 लोगों की जान बचाई थी ।
अमेरिका के 'मेडल ऑफ़ ऑनर' और ब्रिटेन के 'जॉर्ज क्रॉस' के समान है अशोक चक्र

अशोक चक्र अमेरिका के शांतिकाल सम्मान 'मेडल ऑफ़ ऑनर' और ब्रिटेन के 'जॉर्ज क्रॉस' के समान है।

 अशोक चक्र पर वृत्ताकार मेडल पर सोने का पानी चढ़ा होता है


अशोक चक्र का निर्माण 4 जनवरी, 1952 को किया गया था। इस वृत्ताकार मेडल पर सोने का पानी चढ़ा होता है और बीच में अशोक चक्र बना होता है। अशोक चक्र का रिबन 32 MM के गहरे हरे रंग का होता है और बीच में 2 MM का केसरिया रंग की धारी होती है।

इस सम्मान से अब तक 64 लोग नवाजे जा चुके हैं


अनूठी वीरता का प्रदर्शन और निस्वार्थ सेवा के लिए अब तक 64 लोगों को अशोक चक्र से सम्मानित किया जा चुका है।