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Friday, August 14, 2015

सेल्फ पॉट्रेट....

वो सांवली सी लड़की........
 मिलती है आसमां की उड़ान में सदा
 उसे कहो उतर जरा जमीं से पांव लगाए कभी।
वो चुपचाप सी लड़की.........
बोलती है, मगर एहसास को लफ्जों में पिरोकर
गाती है चमकती आंखों से, अनसुना सा गीत कोई
देखूं चेहरा अगर  पर्दा-ए-खामोशी गिराए कभी।
वो परेशान सी लड़की...........
लपेटे आती है ख्वाहिशों को जुल्फ में कैद किए
वो कांच की परीवश है कि छूते ही न चटख जाए कहीं
मचलती है कि फिर संभलती है दिल की तरह
किसी अकेली शाम में सोचती हूं उसे कॉफी पे बुला लूं।
 पूछूं हाल-ए-दिल मुझको सुनाए कभी।
 वो सांवली सी लड़की........।

Saturday, May 9, 2015

'दिल' 'ख्वाहिशों का कारखाना' था

न आह न आहट
न हलचल, न सांस, न जुंबिश
कितना जिद्दी है बदन उसका
सख्त हथौड़े से पैनी कैंची से
खोली जा रही हैं उसके जिस्म की परतें।
बड़ी बेतरतीब सी दुनिया,
 उसके सीने से बाहर निकली है।
किसी रोशनदान से झांकते
धूप के टुकड़े की आंख में कुछ नमी सी है।
बस इक हवा है जो कभी बेजान होठों से टकराकर
कभी सिसकियां तो कभी आह भरती है।
सूखे खून की कुछ वजहें फर्श पर
उभरी हैं एक एब्स्ट्रेक्ट पेंटिंग की तरह,
ेएक पहली से तन को सुलझाने में और भी
उलझ गए हैं औजार,
कठोर हाथों से दस्ताने उतारते हुए
एक धीमी आवाज कहती है
और कुछ भी नहीं , उस जिस्म की
बेड़ियों में बंधा 'दिल' 'ख्वाहिशों का कारखाना' था। - डिम्पल सिरोही-

Thursday, May 7, 2015

ये इत्तेफाक हैं कि मेरे साथ सफर करने आएं हैं...........

कितने किस्से, कितने वाकये ,
 कितने हादसे
 मेरे जीने की खुशी  में
शिरकत करने आएं हैं।
 कुछ सिर झुकाए हैं
 कुछ सिर उठाएं हैं
 कुछ कातिल हैं
कुछ कत्ल करने आएं हैं
छोड़ चली थी इत्तेफाक के शहर में
कुछ ख्वाहिशें
 ये  इत्तेफाक हैं कि मेरे
साथ सफर करने आएं हैं। - डिम्पल सिरोही

Sunday, December 21, 2014

खिड़की से मेरी चांद.......

यूं ही नहीं आता फलक पर 
सुनहरा चांद,
 कोई है जो रोपता है
रोशनी का बीज क्षितिज के उस पार,
कोई है जो सींचता है,
हर रोज नियम के साथ,
बुनता है रेशा-रेशा
किरणों का कोई बांध,
तब
उभरता है अर्श पर
बनके आधा सा टुकड़ा चांद,
कोई है जो सिखाता है
अंगुली पकड़कर चलना इसे,
कोई है जो गोद में लेकर दिखाता है
दुनिया की राह,
कोई है जो दुलार देकर उसे
कायनात को सौंप देता है।

तभी तो हर दिशा में दौड़ता, मुस्कुराता,
अठखेलियां करता हुआ,
झांका करता है हर रोज,
खिड़की से मेरी चांद। 

                       -डिम्पल सिरोही

एक सुरीला कलाम सुनाती है खामोशी,





एक सुरीला कलाम सुनाती है खामोशी,
सन्नाटों में जब गुनगुनाती है खामोशी।

लफ्ज नाकाम रहे कहने में जिसे मुद्दतों,
वो बात कह के चली जाती है मुझसे खामोशी।


सांझा करने लगी हूं राज-ए-दिल इसी से अब,।
गुफ्तगू करने लगी है मुझसे खामोशी।


हो गई हूं और भी करीब अपने ,
मुझको मेरी पहचान सिखाने लगी है खामोशी।


ये शोर दे सका न मुझे कुछ अश्क के सिवा
बस एक मासूमियत से पेश आती है खामोशी। 

                                          -डिम्पल सिरोही

Saturday, September 20, 2014

कल रात
गोलमटोल चांद को देखकर
याद आया चांद की ही तरह,
एक शून्य ही तो हैं हम सभी
कुछ छोटे और कुछ बड़े-बडे,
अनगिनत और अलग रंगों के
कुछ भूरे कुछ मटमैले से।
विचरण करते हैं इस गोल दुनिया में
जहां से शुरू होते हैं वहीं हो जाते हैं खत्म
जिस तरह चांद अनंत अंतरिक्ष में
जहां से चलता है वहीं वापस आकर,
थकान से मूंद लेता है आंखें
इसी तरह हम भी
शून्य से चलकर मिट जाते हैं शून्य पर
और चलता रहता है
सिलसिला शून्य का निरंतर।
- डिम्पल सिरोही

Saturday, July 26, 2014

बदले हजार दौर, मगर रोशनी रही.......


वो कामयाब क्या हुए, इतरा रहे हैं यूं
जैसे कि उनके पांव के नीचे जमीं नहीं।

परवाने जल के मर गए, शमा न बुझ सकी
बदले हजार दौर, मगर रोशनी रही।

हमने दिए जलाए थे इक इश्तियाक से
जल जाएगा शहर ही ये सोचा न था कभी।

फुरसत के लम्हे मांग के मसरूफियत से तुम,
आओ कि बेकरारी की आदत नहीं रही।

इजहार-ए-इश्क तुमको खफा कर न दे कहीं
ख्वाहिश ये आज भी मेरी दिल में ही रह गयी।

Monday, July 14, 2014

कुछ तो कहो.............

रह गई किस चीज की मुझमें कमी कुछ तो कहो
किस तरह होगी मुकम्मल जिंदगी कुछ तो कहो
आज तो जलता हुआ था धूप में मौसम मगर,
फिर हवा में आ गई कैसी नमी, कुछ तो कहो
आसमां सुनसान है क्यों, गुम खड़े हैं क्यों दरख्त,
शहर क्यों उजड़ा हुआ है, तीरगी कुछ तो कहो
घंटियों की क्यों सदा आती नहीं मंदिर से अब,
दूर क्यों बजती नहीं है बांसुरी, कुछ तो कहो
इस अंधेरे के सिवा दिखता नहीं क्यों और कुछ
हो गई सूरज को क्या नाराज़गी कुछ तो कहो
दूर है मुझसे तबस्सुम, गम ही गम नज़दीक है
किस तरह मरकर कटेगी जिंदगी कुछ तो कहो
गर्दिशों की रहगुजर में शाम क्यों आती नहीं
है अभी कितना सफर वीरानगी कुछ तो कहो
तक रहा था देर तक क्यों आईना डिम्पल मुझे
लग रही हूं आज क्या मैं अजनबी कुछ तो कहो

Monday, March 10, 2014

एक इंच की यात्रा .....

मीलों की यात्रा से नहीं खोजी जा सकती है दुनिया
और यह भी  जरूरी नहीं  कि
 बहुत लंबी हो यह, मगर
एक आध्यात्मिक यात्रा से
 एक इंच की यात्रा से
 जो होती है बहुत कठिन, सुखद और खुशहाल
जिससे अपने पैरों के बल पर हम जमीन पर पहुंचते हैं
और रखते हैं अपना पहला कदम
अपने ही घर में घूम लेते हैं हम दुनिया का कोना कोना।

Sunday, March 9, 2014

जब मैं सफर में होती हूं,

 जब मैं सफर में होती हूं,
 तन स्थिर होता है लेकिन
 मन को मिल जाते हैं विषय अनंत।
 मिल जाती है धूमिल पृथ्वी पर कहीं थोड़ी हरियाली,
 और ज्Þारा सा खुश होने को थोड़ी खुशियां।
मिलते हैं बहुत चेहरे पहचानने को,
खामोश रहकर भी जो कह जाते हैं कई कहानियां।
मिलते हैं कतार में पीछे की ओर भागते हुए पेड़,
बिजली के खंभे और स्कूल,
 अडिग विशाल और खड़े सेवा को तत्पर।
 दाढ़ी वाले बूढेÞ मुल्ला भी मिलते हैं
 टूटी झोंपड़ी में करते खेतों की रखवाली
 लिए तलब मगरिब की नमाज़ की।
 मिल जाता है लिए कोई अखबार हाथ में
 कई तरह के मुहं बनाता हुआ पढ़ता खबरें आज की।
 मिलता हैं मां के इंतजार में
 खेत की मेढ़ पर बैठा बच्चा
 बेचैन होकर किनारे से चुनता हुआ सपनों के कंकर।
जब शाम होती है तो गांव की पगडंडियों पर
मुझे मिलती हैं बहुत सारी बालिकाएं
बढ़ते अंधेरे को पीछे धकेलकर तेजी से घर जाती हुई।
 कई बार सफर में बज उठती है मेरे फोन की घंटी
 मधुर लगती है जब तक बजता है संगीत इसमें
फिर मेरे दृश्यों को आनंद छीन लेती है यह।
अधूरी रह जाती है कविताएं मेरी
अतृप्त रह जाता है मन यर्थाथ चित्रों से ।
कल फिर से कहीं सफर पर होंगे हम
मिलेंगे मन को क ई विरले विषय,
और फिर बजेगी मेरे फोन की घंटी और
 फिर से फूटेंगे कुछ शब्द मस्तिष्क में
 फिर रह जाएगी कोई कविता अधूरी।

Thursday, March 6, 2014

स्त्री है वह.......

On 8th March  Women's Day

ते जाते जो घटता है हर और सहा,
 किसी काम को जिसने कभी न नहीं कहा।
बेहतर दिन की आशा में हर रोज निराशा सहती है
 स्त्री है वह
 आराम नहीं है पसंद उसे न ही तुमकों तन्हा रहने देती है
 स्त्री है वह, जो गुजारती है दिन मुस्कुराते हुए
 मगर सोती है सिसकती रातें लेकर,
 स्त्री है वह
 वह, जो दिखती है बहुत मजबूत किंतु
 महसूस करती है बहुत कमजोर
 स्त्री है वह जो, खुद को संभालती है स्वयं
 गिर पड़ती है जब हर मोड़ पर
 स्त्री है वह
 खुद को खोकर मिटाती है दर्द तेरा
 स्त्री है वह जो अपने वजूद की ख्वाहिश में
एक उम्र गंवाती है।

Wednesday, March 5, 2014

जब संभलता हूं ...............

 अभी अभी  कुछ शब्दों को जोड़ा,  कुछ पंक्तियां बन गई जरा गौर फरमाईए .......

 अपनी  हिम्मत का राज  मै बताता हूं,
 जब संभलता हूं तो अपनी पीठ थपथपाता हूं।
 दर्द में भी मुस्कुराता हूं  बेहिसाब,
 इस तरह जलने वालों को मैं जलाता हूं।
 गले मिलकर भी गला दबा देते हैं लोग,
 हाथ मिलाने में लोगों से अब घबराता हूं।
 डूबने से डरता था मगर डूबा तो पार हुआ,
 हर पहाड़ सी मुश्किल को अब राई बनाता हूं।
 यह हकीकत है कि हूं मैं जिद्दी बहुत,
 यही हथियार है इसके बल पर ही हर जंग जीत लाता हूं। 

Monday, May 13, 2013

आसमां भी मिल जाएगा उड़कर तो देख ...............


 अपने हालात- ए- जिंदगी से लड़कर तो देख
 आसमां भी मिल जाएगा उड़कर तो देख ।

 क्यों दुनिया से यहां-वहां लड़ता फिरता है
 खुद से आगे भी कभी निकलकर देख।

ठोकर खाकर उठ जाना कोई नई बात नहीं,
 गिर किसी नजर से फिर संभलकर तो देख।

 वक्त से आगे निकलना तो बड़ी बात हुई,
दो कदम वक्त के साथ ही चलकर तो देख।

 जो भी मिलता है हमें यूं लगे मिला है पहले भी,
 अनजान कहता है मगर इस दफ़ा मिलकर तो देख।

 तूने जिसे दीवार पर लगाई थी कभी अपनीतस्वीर,
 हो गए कितने ही दिन चलके वही घर तो  देख।

Saturday, April 6, 2013

चंद अशआर......


बेटी ने छोड़ा जब मां का आंगन तो एहसास हुआ,
 फूल कोई भी हो शाख का नहीं होता।
 कि निभाने हंै कई किरदार इस नाटक के अभी
 इक शख्स का सौ रूपों में ढलना आसां नहीं होता।
हंसने भी नहीं देता रोने भी नहीं देता
ये दिल हमें किसी का भी होने नहीं देता
 तुम मांगते हो मुझ से मेरी ख्वाहिश
 बच्चा तो कभी अपने खिलौने नहीं देता।
 होली तो चली गई मगर कुछ पंक्तियां ने एक पिता की लाचारी को कुछ यूं कुरेदा.......

 उस नादां पर छाई थी, होली की खुमारी
 कल पप्पू मुझसे मांग रहा था पीतल की पिचकारी
 लाने को तो ला दूंगा मैं, मगर कल खाने को मांगेगा
 तो क्या दूंगा मैं।
 सूखे फूल, कागज की नाव, कुछ तितलियों के पर
 लौटा गया  कहकर कि अमानत किसी की रखता नहीं हूं मैं,
 कोई बतलाए कि बचपन की मोहब्बत  में सियासत नहीं होती।

Wednesday, May 23, 2012

हालात से यूं लड़ते चले गए.....

कभी दर्द दबाया कभी अश्क उमड़ते चले गए
कई-कई गुबार बारहा दिल में घुमड़ते चले गए

हुस्न-ओ-अदा-ओ-इज्जत पे कुबार्नियों का पाठ
इस ख़ैरात-ए-विरासत में पांव गड़ते चले गए

कोई नयी बात नहीं, है ये फितरत लोगों की पुरानी
वो इंसानियत के नाम पे जज्बात उधड़ते चले गए

थी बात अक्ल की उनके लिए, लाजिम थी सियासत
हम दिल से निकली हर बात पे लड़ते चले गए

सुबह-ओ-शाम का रखा जाए किस तरह हिसाब
दिन कम पड़ा तो रात पे भी झगड़ते चले गए

कभी कलम मेहरबान थी, कभी काबिल जुबान थी
हम उम्र भर हालात से बस यूं लड़ते चले गए