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Wednesday, February 25, 2015

कितनी ही गज़लें उलझी हैं......

Dedicated to All the Beautiful Womens of the World.....

कितनी ही गज़लें उलझी हैं तेरे मुलायम बालों पर,
 अटके हैं कितने ही सानी, मिसरे तेरे गालों पर।
 सुरमई रातों, में टपके थे, लफ्ज़ कभी तेरे लब से,
 जुगनूं के मानिंद फिरें हैं, हरसू मेरे खयालों पर।
  याद भी करना भूल गए तुम, याद भी आना भूल गए,
जंग कहीं, लग जाए न इक दिन, इन यादों के तालों पर।
सूरज की पहली किरणों पर, मोती जैसी चमके हैं,
 तेरे कंगन के मोती या, औंस की बूंदें जालों पर।
 दर्द से वो, घबरा जाता है, पूछ न लें कहीं हाले दिल,
 फफ़क के हमदम रो जाएगा, इतने सख़्त सवालों पर।
कितनी ही गज़ले उलझी हैं, तेरे मुलायम बालों पर।
 अटके हैं कितने ही सानी, मिसरे तेरे गालों पर।  -डिम्पल सिरोही

Saturday, July 26, 2014

बदले हजार दौर, मगर रोशनी रही.......


वो कामयाब क्या हुए, इतरा रहे हैं यूं
जैसे कि उनके पांव के नीचे जमीं नहीं।

परवाने जल के मर गए, शमा न बुझ सकी
बदले हजार दौर, मगर रोशनी रही।

हमने दिए जलाए थे इक इश्तियाक से
जल जाएगा शहर ही ये सोचा न था कभी।

फुरसत के लम्हे मांग के मसरूफियत से तुम,
आओ कि बेकरारी की आदत नहीं रही।

इजहार-ए-इश्क तुमको खफा कर न दे कहीं
ख्वाहिश ये आज भी मेरी दिल में ही रह गयी।

Monday, July 14, 2014

कुछ तो कहो.............

रह गई किस चीज की मुझमें कमी कुछ तो कहो
किस तरह होगी मुकम्मल जिंदगी कुछ तो कहो
आज तो जलता हुआ था धूप में मौसम मगर,
फिर हवा में आ गई कैसी नमी, कुछ तो कहो
आसमां सुनसान है क्यों, गुम खड़े हैं क्यों दरख्त,
शहर क्यों उजड़ा हुआ है, तीरगी कुछ तो कहो
घंटियों की क्यों सदा आती नहीं मंदिर से अब,
दूर क्यों बजती नहीं है बांसुरी, कुछ तो कहो
इस अंधेरे के सिवा दिखता नहीं क्यों और कुछ
हो गई सूरज को क्या नाराज़गी कुछ तो कहो
दूर है मुझसे तबस्सुम, गम ही गम नज़दीक है
किस तरह मरकर कटेगी जिंदगी कुछ तो कहो
गर्दिशों की रहगुजर में शाम क्यों आती नहीं
है अभी कितना सफर वीरानगी कुछ तो कहो
तक रहा था देर तक क्यों आईना डिम्पल मुझे
लग रही हूं आज क्या मैं अजनबी कुछ तो कहो

Monday, May 13, 2013

आसमां भी मिल जाएगा उड़कर तो देख ...............


 अपने हालात- ए- जिंदगी से लड़कर तो देख
 आसमां भी मिल जाएगा उड़कर तो देख ।

 क्यों दुनिया से यहां-वहां लड़ता फिरता है
 खुद से आगे भी कभी निकलकर देख।

ठोकर खाकर उठ जाना कोई नई बात नहीं,
 गिर किसी नजर से फिर संभलकर तो देख।

 वक्त से आगे निकलना तो बड़ी बात हुई,
दो कदम वक्त के साथ ही चलकर तो देख।

 जो भी मिलता है हमें यूं लगे मिला है पहले भी,
 अनजान कहता है मगर इस दफ़ा मिलकर तो देख।

 तूने जिसे दीवार पर लगाई थी कभी अपनीतस्वीर,
 हो गए कितने ही दिन चलके वही घर तो  देख।

Thursday, September 20, 2012

दुष्यंत कुमार

दुष्यंत कुमार की सर्वाधिक चर्चित ग़ज़ल ...

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है


एक चिंगारी  कही से ढूंढ लाओ दोस्तो
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है


एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है


एक चादर सांझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है


निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है


दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।