Tuesday, December 10, 2013

 8 दिसंबर 2012 को  मुंबई एब्सोल्यूट इंडिया में प्रकाशित

Friday, October 11, 2013

शूज वॉक अराउंड द वर्ल्ड..


जूते से तो आप परिचित होंगे ही, जूता पैरों में पहनी जाने वाली एक ऐसी वस्तु है, जिसका उद्देश्य चलते खेलते दौड़ते समय पैरों को सुरक्षा और आराम देना है।

केवल काम के वक्त पहना जाता था जूता

समय समय पर संस्कृति के साथ जूते के डिजाइन व रंग रूप में बड़ा परिवर्तन आया है। अपने मूल स्वरूप में जूते काम के समय में पहना जाता था। समकालीन जूते बनावट मजबूती और लागत की दृष्टि से व्यापक रूप में भिन्न होते हैं। बुनियादी सैंडल में केवल एक पतला तला और एक सामान्य पट्टा शामिल था, जबकि अन्य जूते अति विशिष्ट प्रयोजनों के लिए होते हैं, जैसे पर्वतारोहण और स्कीइंग के लिए डिजाइन किए गए जूते। पारंपरिक रूप से जूते चमड़ा, लकड़ी या कैनवास से बनाए जाते रहे हैं, लेकिन उत्तरोत्तर रबर, प्लास्टिक और अन्य पेट्रोरसायन-व्युत्पन्न सामग्री से बनाए जाने लगे हैं। हाल के वर्षों तक, जब विश्व की जनसंख्या के अधिकांश लोगों द्वारा जूते नहीं पहने जाते थे, क्योंकि वे खरीदने में समर्थ नहीं थे। बड़ी संख्या में उत्पादन के आगमन के उपरांत ही जूतों के सस्ती दर पर उपलब्ध होने से, जूते पहनने का चलन प्रबल हुआ है।

चमड़े से बना था पहला जूता

 सर्वाधिक पुराने जूते 1938 में ओरेगन, संयुक्त राज्य अमेरिका में पाए गए 8000 से 7000 ई पू पुराने सैंडल हैं। दुनिया का सबसे पुराना चमड़े का जूता जो गोचर्म के एक ही टुकड़े से बना था और सामने तथा पीछे सीवन के साथ चमड़े की डोरी से बांधा गया था, यह 2008 में आर्मेनिया की एक गुफा में पाया गया है और यह विश्वास किया जाता है कि यह 3500 ईसा पूर्व का है। 3300 ईसा पूर्व पुराने पर्वतारोहियों के जूते, ओत्जी जिनके तले भालू की खाल से बने थे। हालांकि, जूते बनाने के लिए सर्वाधिक उपयोग किया जाने वाला पकाया हुआ चमड़ा, सामान्यत हजारों वर्ष तक नहीं टिक सकता, इसलिए संभवत इससे पूर्व भी जूतों का प्रयोग होता होगा।  जूतों का उपयोग आज से 40,000 से 26,000 वर्ष पूर्व के बीच आरंभ हुआ था, जैसे ही यूरोप ने धन और शक्ति प्राप्त की, बढ़िया और महंगे जूते हैसियत के प्रतीक बन गए।  कारीगर अमीर ग्राहकों के लिए अद्वितीय जूते बनाते थे, और नई शैली विकसित करत थे। इसी श्रेणी में  एक सिले हुए तले वाले आधुनिक जूते का आविष्कार हुआ। 17वीं सदी से, चमड़े के जूतों में सिले हुए तले का सर्वाधिक उपयोग किया जाता है। आज भी यह बेहतर गुणवत्ता वाले कपड़े पहनने वालों के लिए जूते का मानक बना हुआ है। 1800 के आसपास तक, जूते बाएं या दाएं पैर का अंतर किए बिना बनाए जाते थे। इस तरह के जूतों को अब स्ट्रेट्स कहा जाता है। 20वीं सदी के बाद से, रबर, प्लास्टिक, सिंथेटिक कपड़ा और औद्योगिक आसंजकों के क्षेत्र में प्रगति ने निमार्ताओं को जूते की पारंपरिक निर्माण तकनीक से उल्लेखनीय रूप में परे हटकर जूतों के निर्माण के अवसर दिए।

इतनी तरह के जूते

स्प्रैडिल्स- सैंडल, जो आज भी पहने जाते हैं, अधिकतम 14 वीं सदी जितने पुराने हैं।  इसी तरह खड़ाऊं व्यक्ति के पैरों को बाहर से  सूखा रखने के लिए लकड़ी का एक यूरोपीय आवरण जूता था। इसे सबसे पहले मध्य युग में पहना गया और 20वीं सदी के शुरू तक भी इसका इस्तेमाल जारी रहा। कुछ डच, फ्लेमिंग्स और कुछ फ्रेंच लोगों ने इसी प्रकार के पूरी तरह से ढके हुए नक्काशीदार लकड़ी के जूते तैयार किए। लकड़ी से ही बना आगे से लंबा व नोकदार जूता 15वीं सदी में काफी लोकप्रिय रहा। उत्तरी अमेरिकी जनजातियों द्वारा पहना जाने वाला मोकासिन एक ऐतिहासिक जूता था।

पुरुष भी पहनते थे हाइहील

आपको जानकर हैरानी होगी की कभी पुरुष भी महिलाओं की ही तरह हाई हील पहना करते थे। ऊंची एड़ी जूते के इतिहास की बात की जाए तो फ्रांस के लुइस चौदहवें का जिक्र करना जरूरी है। दरअसल वह एक महान शासक था, लेकिन उसकी लंबाई केवल पांच फुट चार इंच थी। उसने अपनी इस कमी को पूरा करने के लिए 10 इंच की हील के जूतों से पूरा किया। उसके जूतों की हील्स पर अक्सर उसके द्वारा जीते गए युद्धों को जिक्र उकेरा जाता था। 1740 तक पुरुषों ने ऊंची हील का इस्तेमाल करना बंद कर दिया था। 50 साल बाद ए ऊंची हील के जूते महिलाओं के पैरों से भी गायब हो गए।
-   जूते ने परी कथाओं सिंड्रेला, द  वंडरफुल विजार्ड आॅफ ओज तथा द रेड शूज में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
-    साहित्य फिल्म में, खाली जूता या जूते की जोड़ी को मृत्यु का प्रतीक माना जाता है। 
-    मध्य पूर्व, अफ्रीका के कुछ भाग, कोरिया और थाईलैंड में किसी को जूतों के तले दिखाना असभ्यता मानी जाती है
-    जूता फेंकना मध्य पूर्व के कुछ भागों और भारत में एक बड़ा अपमान माना जाता है।
-    थाइलैंड में पैर, जुराब या जूते का किसी के सिर से छू जाना या सिर पर रखना एक  चरम अपमान समझा जाता है।
-    दुनिया का सबसे महंगी सैंडल  276.000 पौंड से अधिक कीमत के है। इसमें एक लाख सफेद हीरे लगे हैं। जिसकी भारतीय मुद्रा में कीमत तीन करोड़ के लगभग है। डिजाइनर कोथ्रिन विल्सन ओक्लेंड ओर्सिनी  ने ए जूते तैयार किए हैं।
-    इटली की कंपनी मिनेल्ली को जूतों पर भगवान राम के चित्र छापे जाने के कारण जूते बाजार से वापस लेने पड़े थे।
-  स्टुअर्ट विहट्ज्मेन आज के समय में महंगे जूते डिजाइन करने के लिए प्रसिद्ध हैं।

Sunday, August 25, 2013

जिम्बाब्वे के नायक हैं रॉबर्ट मुगाबे...

राबर्ट गेबिरियल मुगाबे ने जब 23 अगस्त को जिम्बाब्वे के राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली, तो उमड़ी भीड़ को देखकर लग रहा था कि वह आज भी अपने देश की जनता के दिल में जगह बनाए हुए हैं। 21 फरवरी वर्ष 1924  को दक्षिणी रोडेशिया के कुतामा में जन्मे मुगाबे के पिता एक कारपेंटर थे, जो साउथ अफ्रीका के एक जैसुट मिशन पर कार्य करते थे और एक दिन अचानक रहस्यमई तरीके से गायब हो गए थे। छह बच्चों के साथ मुगाबे की मां अब अकेली थी। मुगाबे अपने बहन भाइयों में तीसरे नंबर हैं। उन्होंने अपने परिवार की मदद करने के लिए छोटी नौकरी करनी शुरू कर दी। मुगाबे की सोसायटी में अच्छी शिक्षा ग्रहण करना बच्चों के लिए सपना था, लेकिन मुगाबे उनमें से भाग्यशाली थे कि उन्हें अच्छी शिक्षा ग्रहण करने का मौका मिला।
मुगाबे ने अपनी प्राथमिक शिक्षा के बाद 1951 में अंग्रेजी और इतिहास में साउथ अफ्रीका की यूनिवर्सिटी से  बैचलर डिग्री प्राप्त की, जिसके बाद वह शिक्षक के तौर पर कार्य करने के लिए अपने होमटाउन वापस आ गए। 1955 में वह उत्तरी रोडेशिया चले आए, जहां उन्होंने चालिंबाना में चार वर्षों तक अध्यापन का कार्य किया। घाना आने के बाद उन्होंने 1958 में अर्थशास्त्र में डिग्री हासिल की और सेंट मेरी टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज में शिक्षण कार्य करने लगे। यहीं पर उनकी मुलाकात शैली हेयफ्रॉन से हुई, जिससे उन्होंने 1961 में विवाह किया। दुर्भाग्यवश बीमारी के कारण पत्नी की मृत्यु हो गई। उनका एकमात्र बेटा माइकल नहामोडजेनियाका भी केवल तीन वर्ष की उम्र में चल बसा।
घाना में ही मुगाबे ने खुद को मार्क्सवादी घोषित किया। 1963 में उन्होंने कुछ समर्थकों के साथ ह्यजिम्ब्वावे अफ्रीकन नेशनल यूनियनह्ण की स्थापना की।  वह पहली बार 1960 में उस समय प्रसिद्ध हुए, जब रोडेशिया में गोरे लोगों का राज चल रहा था और मुगाबे ने गोरे शासन के खिलाफ छापामार युद्ध छेड़ रखा था। 1964 से 1974 के बीच वह एक राजनीतिक कैदी रहे। स्वतंत्रता युद्ध के बाद वह अफ्रीकियों के नायक के तौर पर उभर कर सामने आए थे। 1980 में वह पहली बार जिम्ब्बावे के प्रधानमंत्री बने थे। 1987 में उन्होंने पहली बार राष्ट्रपति का पद हासिल किया। 1990, 1996 व 2002 में वह दोबारा राष्ट्रपति पद के लिए चुने गए। 2008 में वह फिर से राष्ट्रपति बने। मुगाबे 1990 से यूनिवर्सिटी आॅफ जिम्ब्बावे के चांसलर भी रह चुके हैं। 1996 को मुगाबे ने अपनी पूर्व सेक्रेटरी ग्रेस मारूफू से विवाह किया, जो अपनी शॉपिंग के कारण हमेशा चर्चा में रहती हैं।

Thursday, July 25, 2013

मर्दों से बेहतर होती महिला सेलिब्रिटी

 क्या उन्हें औरत होने का फायदा मिलता है या फिर वे वाकई मर्दों से बेहतर होती हैं. वजह जो भी हो, कमाई देखें, तो पता चलता है कि महिला सेलिब्रिटी पैसों के मामले में दो कदम आगे चल रही हैं.फोर्ब्स ने जो ताजा सूची जारी की है, उसमें 30 साल से कम उम्र के लोगों का जिक्र है. 10 में से सात सेलिब्रिटी महिला हैं और लेडी गागा सबसे ऊपर मौजूद हैं. 27 साल की गागा ने पिछले साल कोई आठ करोड़ डॉलर कमाए, जो किसी भी रिकॉर्ड से ज्यादा है.लेडी गागा तो इससे भी कहीं ज्यादा कमा सकती थीं लेकिन उनका कूल्हा टूट गया और उन्हें चार टूर रद्द करने पड़े. इसके बाद वह अपने 24 कैरेट सोने से जड़ी व्हील चेयर में ज्यादा नजर आईं. उनकी कमाई ने कनाडियाई पॉप स्टार 19 साल के जस्टिन बीबर को भी बौना साबित कर दिया, जिनकी कमाई कोई 5.8 करोड़ डॉलर रही. कमाई की लिहाज से 30 साल से कम वाले टॉप 10 सेलिब्रिटी-
1. लेडी गागा (8 करोड़ डॉलर)

2. जस्टिन बीबर (5.8 करोड़ डॉलर)

3. टेलर स्विफ्ट (5.5 करोड़ डॉलर)

4. कैल्विन हैरिस (4.6 करोड़ डॉलर)

5. रिहाना (4.3 करोड़ डॉलर)

6. केटी पेरी (3.9 करोड़ डॉलर)

7. अडेल (3 करोड़ डॉलर)

8. जेनिफर लॉरेंस (2.6 करोड़ डॉलर)

9. क्रिस्टेन स्टीवर्ट (2.2 करोड़ डॉलर)

10. टेलर लॉटनर (2.2 करोड़ डॉलर)

नए नए रईस....

 चीन को पैसा बनाने की मशीन कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी, लेकिन अपनी संस्कृ ति और परंपराओं को लेकर आज भी अपने पुराने ढर्रे पर चल रहा हैं। जी हां, आपको जानकर हैरानी हो रही होगी कि अपने मशीनी पॉवर और टैक्नीक का परचम लहराने वाले चीन के रईस अब सलीके भी सीखने लगे हैं।  हाल ही के दिनों में तेजी से रईस हुए चीनी हुकमारान नारंगी छीलने, कांटा और छुरी पकड़ने की तालीम हासिल कर रहे हैं। दो हफ्ते के इस कोर्स की फीस करीब नब्बे हजार रुपए है और इसमें दाखिला लने वालों की अच्छी खासी भीड़ भी। कोर्स को चलाने वाली सारा जैन के मुताबिक चीन की बड़ी आबादी दो बिल्कुल अलग पीढ़ियों के बीच फंस गई है, क्योंकि उनके बच्चे एक उन्मुक्त समाज में जी रहे हैं जिसके चलते उन्हें एक साथ कई जिम्मेदारियां निभानी पड़ रही हैं। सारा की मानें तो यहां आने वाले  50 प्रतिशत संख्या ऐसे लोगों की है, जो कोर्स की फीस का तीन गुना कीमत देने की हैसियत रखते हैं। यही नहीं, यहां आने वाले लोगों में 400 से भी ज्यादा संख्या हाई सोसाइटी लेडीज की है, जो कपड़े पहनने के शऊर से लेकर गोल्फ, राईडिंग जैसे खास खेलों की जानकारी लेती हैं, प्रसिद्ध वाइनों के बारे में जानती हैं और चाय परोसने व टेबल सजाने के तरीके सीख रही हैं। चीन में हाई सोसाइटी की अधिकतर महिलाएं किसी बड़ी शादी में जाने पर सिर्फ इसलिए खाना नहीं खाती क्योंकि, उन्हें यह नहीं मालूम कि वैस्टर्न कल्चर के मुताबिक कैसे खाया जाता है यानी कैसे छुरी और कांटे का इस्तेमाल होता है। यही, नहीं यहां आने वाले ऐसे पुरुष भी हैं, जिन्हें यह सिखाया जाता है कि किसी से पहली ही मुलाकात में ही यह नहीं पूछना चाहएि कि तुम कितना कमाते हो या फिर तुमने अपनी पत्नी से तलाक क्यों ले लिया। इस कोर्स की प्रशिक्षक जोसलिन वांग का कहना है कि किसी भी बड़े अधिकारी या सेलिब्रिटी के लिए उसके खाने व छुरी व कांटे को पकड़ने का तरीका उसकी शख्शियत बताने के लिए बड़ा रोल अदा करता है। यानी कहा जाए कि चीन के लोग नए नए रईस हुए हैं इसलिए रईसों के तौरतरीके भी अपनाने ही पड़ेंगे और पुरानी व नई पीढ़ी के फासले को खत्म करने के लिए यह भी जरूर ही है।

Saturday, July 6, 2013

अदली मंसूर के सिर पर कांटों का ताज .............

मिस्र  के मुख्य न्यायाधीश अदली मंसूर ने नहीं सोचा होगा कि हालात ऐसे हो जाएंगे कि उन्हें मिस्र के अंतरिम राष्ट्रपति की शपथ लेनी पड़ेगी। हकीकत यह है कि वह अब ऐसे मुल्क के शासक बन गए हैं, जो उथल-पथल के दौर से गुजर रहा है और जिसे स्थायित्व की जरूरत है। ऐसे में मंसूर के लिए राष्ट्रपति का ताज कांटों भरा है और राह मुश्किल। मंसूर की नियुक्ति वर्ष 2011 में तैयार हुए कानून के तहत हुई है, जो अदालत को स्वतंत्रता प्रदान करता है तथा राष्ट्रपति की शक्तियां कम करता है।
23 दिसंबर 1945 को काहिरा में जन्मे अदली  मंसूर का पूरा नाम अदली महमूद मंसूर है। मंसूर एक पुत्र व दो पुत्रियों के पिता हैं। उन्होंने वर्ष 1967 में काहिरा यूनिवर्सिटी स्कूल आॅफ लॉ से स्नातक की डिग्री हासिल की तथा वर्ष 1969 में कानून में परास्नातक डिग्री प्राप्त की थी। यही नहीं, उन्होंने अर्थशास्त्र की शिक्षा के साथ मैनेजमेंट साइंस में भी 1970 में पोस्टग्रेजुएट डिग्री हासिल की है। वर्ष 1984 में वह मिस्र की राज्य परिषद के चांसलर के रूप में कार्यरत रहे। वर्ष 1992 तक एससीसी यानी सुप्रीम कांस्टीट्यूशनल कोर्ट के उप प्रमुख के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं।
माना जा रहा है कि मिस्री सेना प्रमुख अलसीसी के हाथों में ही सत्ता रहेगी। उन्होंने पिछले ही वर्ष हुसैन तंतावी की जगह रक्षा मंत्री पद का स्थान ग्रहण किया है। अल सीसी रोज नमाज करने वाले मुसलमान जरूर हैं, लेकिन वह सेक्युलरइज्म में यकीन रखते हैं। आज मिस्र की जनता की भी यही ख्वाहिश है कि मिस्र पर वही व्यक्ति शासन करे, जो कट्टरपंथी न हो। जाहिर है कि इस मामले में अदली मंसूर के रूप में सेना प्रमुख का चुनाव सही है। इस मुश्किल वक्त में मुर्सी की नाकामी के बाद मिस्र की जनता ने फिर से सेना पर भरोसा किया है। अल सीसी के जनरल जनता का भरोसा जीतने में तो कामयाब हो गए हैं, लेकिन उनकी उम्मीदों पर कितने खरे उतरते हैं, यह देखने वाली बात होगी।
अल सीसी के साथ ही अंतरिम राष्ट्रपति अदली मंसूर पर पहली सबसे बड़ी जिम्मेदारी तो यही है कि वह जल्दी ही नए राष्ट्रपति के लिए शांतिपूर्वक चुनाव कराएं। दूसरे यह कि मिस्र को आर्थिक मोर्चे पर मजबूती प्रदान करें। तीसरी यह कि मुसलिम ब्रदरहुड को हिंसक प्रतिक्रिया करने से बाज रखें। हालांकि अल सिसी ने वादा किया है कि सेना राजनीति से जाहिर तौर पर दूर रहेगी, लेकिन वह अदली मंसूर को कठपुतली नहीं बनाएगी, यह देखने वाली बात होगी। मुर्सी का तैयार किया हुआ इसलामी संविधान निलंबित किया जा चुका है। अदली मंसूर को बहुत सावधानी के साथ कदम बढ़ाने होंगे। मिस्र की जनता को तहरीर चौक पर जमा होने में देर नहीं लगती।