Saturday, September 20, 2014

कल रात
गोलमटोल चांद को देखकर
याद आया चांद की ही तरह,
एक शून्य ही तो हैं हम सभी
कुछ छोटे और कुछ बड़े-बडे,
अनगिनत और अलग रंगों के
कुछ भूरे कुछ मटमैले से।
विचरण करते हैं इस गोल दुनिया में
जहां से शुरू होते हैं वहीं हो जाते हैं खत्म
जिस तरह चांद अनंत अंतरिक्ष में
जहां से चलता है वहीं वापस आकर,
थकान से मूंद लेता है आंखें
इसी तरह हम भी
शून्य से चलकर मिट जाते हैं शून्य पर
और चलता रहता है
सिलसिला शून्य का निरंतर।
- डिम्पल सिरोही

Saturday, July 26, 2014

बदले हजार दौर, मगर रोशनी रही.......


वो कामयाब क्या हुए, इतरा रहे हैं यूं
जैसे कि उनके पांव के नीचे जमीं नहीं।

परवाने जल के मर गए, शमा न बुझ सकी
बदले हजार दौर, मगर रोशनी रही।

हमने दिए जलाए थे इक इश्तियाक से
जल जाएगा शहर ही ये सोचा न था कभी।

फुरसत के लम्हे मांग के मसरूफियत से तुम,
आओ कि बेकरारी की आदत नहीं रही।

इजहार-ए-इश्क तुमको खफा कर न दे कहीं
ख्वाहिश ये आज भी मेरी दिल में ही रह गयी।

Monday, July 14, 2014

कुछ तो कहो.............

रह गई किस चीज की मुझमें कमी कुछ तो कहो
किस तरह होगी मुकम्मल जिंदगी कुछ तो कहो
आज तो जलता हुआ था धूप में मौसम मगर,
फिर हवा में आ गई कैसी नमी, कुछ तो कहो
आसमां सुनसान है क्यों, गुम खड़े हैं क्यों दरख्त,
शहर क्यों उजड़ा हुआ है, तीरगी कुछ तो कहो
घंटियों की क्यों सदा आती नहीं मंदिर से अब,
दूर क्यों बजती नहीं है बांसुरी, कुछ तो कहो
इस अंधेरे के सिवा दिखता नहीं क्यों और कुछ
हो गई सूरज को क्या नाराज़गी कुछ तो कहो
दूर है मुझसे तबस्सुम, गम ही गम नज़दीक है
किस तरह मरकर कटेगी जिंदगी कुछ तो कहो
गर्दिशों की रहगुजर में शाम क्यों आती नहीं
है अभी कितना सफर वीरानगी कुछ तो कहो
तक रहा था देर तक क्यों आईना डिम्पल मुझे
लग रही हूं आज क्या मैं अजनबी कुछ तो कहो

Sunday, July 6, 2014

याद शहर....

  मेरे मन में कल ख्याल आया कि मैं जब पहली बार मेरठ आई थी, तो सोचा था यहां बहुत सी ख्वाहिशों, सपनों और कल्पनाओं को पंख लगाने हैं। लेकिन मुझे ये शहर कभी रास नहीं आया। हो सकता है इसे मैं पसंद नहीं या मुझे यहां रहने का ढंग नहीं आता। हर बार इस शहर से दूर हो जाने की योजना बनती है, मगर मुकाम तक नहीं पहुंचती। पता नहीं क्यों, ये शहर मुझे कहीं और क्यों नहीं जाने देता, हर बार मुझे यहां किसी न किसी बहाने कैद किए रहता है। मैं ऊब गई हूं इस शहर से अलविदा कहना चाहती हूं इसे। इसी ऊब को मैनें कुछ यूं निकाला है                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                              धूप धुंधलाई हुई और जिंदगी कुम्हलाई हुई सी,
तपती धूप में जल जाते थे पांव,
 सड़कों पर दौड़ता था सन्नाटा कुछ बुदबुदाता सा,
 कुछ जिस्म रेंगते थे, कुछ रूहें ठिठुरती थीं धूप की चुभन से,
मेरी परछांई मुझी में समा जाती थी हर कदम
 आंखों में ख्वाब समेटे चली जा रही थी मैं
 हाथों में जिंदगी थामे,
 हा,ं जिंदगी ही तो थी
 कुछ ओढ़न, पैरहन और खाने का सामान,
 इस शहर में कोई भी तो नहीं था मेरा
 अकेले घूमना था मुझे सरे शहर तेरा।
 बरसती थी धूप उन गलियों में फिर भी था अंधेरा
 खुले थे द्वार,
 मगर खाली था बसेरा।
मैंने झांका तो वक्त के कुछ बासी लम्हों को पाया,
आवाज दी मगर कोई आहट, साया कोई भी तो नहीं आया।
कितना अकेला था यह शहर,
 हर मोड़ पर रूक के पुकारा कि कोई सुनेगा आहट,
 कोई रोकेगा कहेगा कि कुछ देर यहां ठहर।
 फिर लगा कहीं ऐसा तो नहीं,
 हो ये लुटेरों का शहर।
सोचा ही था कि  आके एक बच्चे ने पकड़ लिया दामन
बोला अजनबी हो.. आओ तुम्हें इस शहर से मिलवाता हूं
उस आवाज में कसक थी मासूमियत और सच्चाई थी
हाथ पकड़े हुए बढ़ चला था खामोशियों की ओर
 मेरे सवालों को मिला भी न था जवाब कि उसने इशारा किया
 यहां रहती है मुफ़लिसी,लाचारी, बीमारी, हयात, यहीं मैं रहता हूं।
ये कर्जदारों, ब्याजखोरों, मनचलों और लुटेरों को मोहल्ला है।
 इस कोने पर रहती है थोड़ी ईमानदारी सज्जनता और होशियारी
पर्दे में ही रहा करती है अक्सर
उस तरफ कभी न जाना वहां मुर्दे सोएं हैं।
साया था या फरिश्ता, इतना कहकर गुम हो गया था कहीं।
 उसके जाते ही मेरे कानों में गूंजा भयंकर स्वर
घने शोर की आवाज सुनी थी अचानक मैनें
या किसी ख्वाब से जागी थी यकायक मैं।
 नहीं, अचानक नींद से जागा था ये शहर
 मैनें देखा, मुझे हिरासत में ले चुकीं थी सैकड़ों आवाजें।
 इस जुर्म की गिरफ्त में थी मैं कि मैंनें देखा था
 एक ख्वाब।
शोर के शहर में आज तक बंदी हूं वहां मैं जहां
 न अंधेरा है, न उजाला है, न दिन न रात,
 थकते-टूटते जिस्मों में जब दर्द को नींद आने लगती है
 ज़र्द चेहरा लिए एक चांद फ़लक पर आता है हर रोज,
 कहता है मुश्किल है, मगर
कैद-ए-जां से अच्छा है आसमानों को शहर
 मुझे यकीं है मिलेगी एक दिन मुझको रिहाई जरूर
होंगे आजाद सारे ख्वाब फ़लक के चांद की तरह
 जिंदगी की नव्ज़ पर पड़े बेड़ियों के निशान
 वक्त तो मिटा न सकेगा मगर,
 इसी बहाने ही सही रहेगा तेरा याद शहर।

Saturday, July 5, 2014

 घर की अलमारी में, दराजों में, पुराने बक्से में
 बहुत ढूंढा  मगर, बीता वक्त कहीं मिला नहीं।

Tuesday, April 22, 2014