
निगम के हालात भी बयां कर ही लेते हैं। आप निगम में पहुंचे नहीं कि जोर-शोर से आपका अतिथि सत्कार और आव भगत शुरू हो जाती है। यात्री प्रतीक्षालय में बैठे गन्नारस, चाय, टॉफी-बिस्कुट और कोल्ड ड्रिंक वाले पलकें बिछाए आपका इंतजार करते नजर आते हैं। अब अगर इनके सेवा भाव के कारण आपको बैठने या खड़े होने की जगह न मिले तो इसमें निगम का क्या कुसूर, इनके न होने का खामियाजा भी तो आप ही को भुगतना पड़ सकता है, इन्हीं की बदौलत तो आपको अपना सामान छोड़कर खाद्य सामग्री का इंतजाम नहीं करना पड़ता। निगम के प्रांगण में खड़े सांडों, सुस्ताते कुत्तों व पॉलिथीन चबाती गायों को आप भला कैसे भगा सकते हैं। जीवों पर दया करने का पाठ बचपन से ही आपको पढ़ाया जाता है, तब भला निगम इतना असहिष्णु कैसे हो सकता है।
अब इंक्वायरी लिखे काउंटर पर किसी यात्री वाहन की जानकारी लेने के लिए आप वहां पधारें, तो पहले तो आपको परेशान करने के लिए वहां कोई मौजूद नहीं होगा। बेझिझक खड़े होकर आप वहां की शोभा को निहार सकते हैं और लकीली यानी भाग्यवश आपको कोई मिल भी गया, तो वह पहले तो आपको ऐसे प्रेम से निहारेगा, जैसे आपने उसका कुछ उधार लेकर वर्षों से दिया न हो। फिर वह आपको बिना डांटे-फटकारे, अदब में नीचे सिर झुकाए, तेजी से जो बताना है बता देगा, अब आपको समझ में न आए तो इसमें उसका क्या दोष! आपकी ही गलती है जो ठीक से नहीं सुन पाए।
आप बस में सवार हो जाइए। बस में चढ़ते ही आप चैं-पैं के शिकार हो जाएंगे। आपके बैठते ही चूरन, किताब, दंतमंजन, घड़ी व टार्च बेचने वाले बारी-बारी से अपनी लयबद्ध लेकिन ककर्श आवाज से आपका मनोरंजन करेंगे। अब भला ये नहीं होंगे, तो प्रस्थान के इंतजार में इतनी देर खड़ी रही बस में आपका एंटरटेनमेंट कैसे होगा। थोड़ी ही देर में आपको बस में इतने प्रेम से आगे या पीछे खिसकाया जाएगा, कि आपको यह रोडवेज की बस अपने गंतव्य तक पहुंचते-पहुंचते मां की गोद जैसा आराम देगी और आप शहर की सिटी बस के आराम को तो भूल ही जाएंगे। परिचालक ओवर लोडिंग थोड़े ही करते हैं, ये तो आप ही हैं जो दूर-दूर से उड़कर पतंगों की तरह बस स्टैंड पर आ पहुंचते हैं। अब परिचालक न बैठाकर पाप का भागी वह क्यों बने!
यदि आप महिला सीट पर किसी पुरुष को बैठा देखें, तो कृपया इसे अनैतिक न कहें, क्योंकि यह शब्द तो निगम के किसी कानून में है ही नहीं। बस के चालक व परिचालक के व्यवहार से तो आपको सीख लेनी चाहिए, चाहे वह चालक का अपने पड़ोसी वाहन चालकों को गाली देना हो या परिचालक का यात्रियों द्वारा खुले पैसे न देने पर बेअदबी से पेश आना हो। यहां तक कि कुछ दूरी के लिए बस में सवार एक महिला कांस्टेबल से हाथापाई करने तक की बात ही क्यों न हो। हां यह अलग बात है कि भले ही खाकी रंग के कपड़ो वाले उनके काकाजी एक रुपया दिए बिना कितनी ही दूर जा सकते हैं। आखिर यही तो सिखाते हैं कि ‘हक’ कैसे मिलता है। खैर, जो भी हो, आपको अपनी यात्रा पर जाना है, फिर मिलेंगे, फिलहाल तो यही कहेंगे कि उत्तरप्रदेश परिवहन निगमश्री की इन बसों और कर्मचारियों के साथ आपकी यात्रा मंगलमय हो।
बढ़िया। बस थोड़ी मेहनत से न चूकना, और अच्छा-अच्छा लिखोगे, और हम तो ख़ैर पढ़ेंगे ही।
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